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जानलेवा गर्मी के लिए हो जाएं तैयार… 2050 तक 5 गुना बढ़ जाएंगी मौतें, लांसेट की रिपोर्ट पढ़ लीजिए

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नई दिल्ली

दुनिया में जलवायु परिवर्तन के गंभीर परिणाम आने वाले कुछ सालों में देखने को मिल सकते हैं। जानकारों का मानना है कि तापमान का मौजूदा रुझान यदि जारी रहा और अनुकूलन पर कोई प्रगति नहीं हुई तो गर्मी से होने वाली सालाना मौत के आंकड़ों में सदी के मध्य तक पांच गुना वृद्धि होने की आशंका है। स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन पर ‘लांसेट काउंटडाउन’ की एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई। जलवायु निष्क्रियता की इस पृष्ठभूमि में, स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन पर लांसेट काउंटडाउन ने अपनी आठवीं वार्षिक वैश्विक रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि गर्मी से संबंधित श्रम हानि 50 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।

इसमें कहा गया है कि अकेले लू के कारण 2041-60 तक 52.49 करोड़ अतिरिक्त लोगों को मध्यम से गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना करना पड़ सकता है। इससे कुपोषण का वैश्विक खतरा और बढ़ जाएगा। रिपोर्ट में सदी के मध्य तक प्राणघातक संक्रामक रोगों के प्रसार में वृद्धि का अनुमान लगाया गया है, जिसमें वाइब्रियो रोगजनकों के लिए उपयुक्त समुद्र तट की लंबाई 17-25 प्रतिशत तक बढ़ रही है। डेंगू की संचरण क्षमता 36-37 प्रतिशत तक बढ़ रही है। वाइब्रियो रोगजनक हैजा जैसी खाद्य जनित बीमारियों के लिए जिम्मेदार हैं।

ब्रिटिश जर्नल की वेबसाइट के अनुसार, स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन पर लांसेट काउंटडाउन एक अंतरराष्ट्रीय, बहु-विषयक गठबंधन है। इसे वार्षिक रूप से प्रकाशित किया जाता है। रिपोर्ट में कहा गया कि जलवायु निष्क्रियता की कीमत आज जीवन और आजीविका से चुकानी पड़ रही है। नए वैश्विक अनुमानों से जलवायु परिवर्तन पर कार्रवाई में और देरी से स्वास्थ्य के लिए गंभीर और बढ़ते खतरे का पता चलता है। इसमें कहा गया कि प्रति सेकंड 1,337 टन कॉर्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जित होने के साथ हर क्षण की देरी से लोगों के स्वास्थ्य और अस्तित्व पर खतरा बढ़ जाता है।

रिपोर्ट दुनिया भर के 52 अनुसंधान संस्थानों और संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों के 114 वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य चिकित्सकों की विशेषज्ञता पर आधारित है। विश्लेषण से पता चला कि 2020 में स्वास्थ्य के लिए खतरनाक उच्च तापमान तक पहुंचने वाले कुल दिनों में से 60 प्रतिशत से अधिक में मानव-जनित जलवायु परिवर्तन होने की संभावना दोगुनी से अधिक हो गई। इसके अलावा, विश्लेषण में पाया गया कि 1990-2000 की तुलना में 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में गर्मी से संबंधित मौतों में 85 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

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