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पहलगाम का ये संयोग या पाक प्रायोजित प्रयोग?, तब 25 साल पहले क्लिंटन के दौरे पर 35 सिखों को मार दिया था

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नई दिल्ली

पहलगाम की वारदात ने 25 साल पहले की उस आतंकी घटना की याद ताजा कर दी है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिटंन भारत दौरे पर थे और आतंकियों ने 35 सिखों को मौत के घाट उतार दिया था। अभी जब अमेरिकी उप राष्ट्रपति जेडी वेंस भारत दौरे पर हैं तो एक और बड़े हमले को अंजाम दिया गया है जिसमें 28 लोगों की जान चली गई।

बहरहाल, पहलगाम आतंकी हमले से जिस तरह पूरा देश हिल गया है, उसी तरह आज से ठीक 20 साल पहले, 20 मार्च 2000 को, दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले के चित्ती सिंहपुरा गांव में सशस्त्र हमलावरों ने 35 सिख पुरुषों को मौत के घाट उतार दिया था। गांव में लगभग हर किसी को वह शाम ठीक उसी तरह याद है। हमलावर शाम करीब 7:30 बजे आए। उन्होंने गांव के पुरुषों को गुरुद्वारे के सामने लाइन में खड़ा किया। फिर उन्हें गोली मार दी।

गांव वालों के लिए मार्च का महीना दुखभरा होता है
रिसर्च स्कॉलर खुशदीप मल्होत्रा लिखते हैं, हरे-भरे सेब के बागों के बीच छिपे हुए इस गांव को ढूंढना मुश्किल है। सिवाय इसके कि प्रवेश द्वार पर एक पीला बैनर लगा है। इसे ‘शहीदों दा पिंड’ यानी शहीदों का गांव के रूप में जाना जाता है। पचीस साल के बानी (बदला हुआ नाम) कहते हैं कि वे इसे बस भूल रहे हैं, वे इसे भूलने की कोशिश कर रहे हैं। बानी के पिता उन लोगों में से एक थे जिनकी हत्या कर दी गई थी। मार्च का महीना इस गांव के लिए एक मुश्किल महीना होता है। लेकिन बानी को ऐसा लगता है कि लोग आगे बढ़ गए हैं।

यादों को बनाए रखने की कवायद जारी
गुरुद्वारा समुंद्री हॉल के अंदर के दृश्य तकलीफ देते हैं। यहीं पर ‘शहीदों’ का अंतिम संस्कार किया गया था। गांव के लोग उन्हें शहीदों के रूप में याद करते हैं। बादी का कहना है कि गुरुद्वारा के सामने 35 में से 17 पुरुषों को लाइन में खड़ा करके गोली मार दी गई थी। अभी गुरुद्वारा पर केवल दीवार में गोलियों के निशान हैं, जिन्हें पीले रंग से हाइलाइट किया गया है।

2018 की शुरुआत में, बिजली की खराबी के कारण लगी आग ने गुरुद्वारा समुंद्री हॉल के लगभग सभी हिस्सों को अपनी चपेट में ले लिया। इसमें वह दीवार भी शामिल थी जिस पर शहीदों की तस्वीरें थीं। गांव वालों ने इसे दूसरा ‘शहीदी’ माना। चित्ती सिंहपुरा नरसंहार को स्मृति में बनाए रखने के लिए एक ‘ऐतिहासिक’ गुरुद्वारा बनाने के उद्देश्य से इसके मुख्य अग्रभाग के पुनर्निर्माण का काम चल रहा है।

पीड़ित मांग रहे इंसाफ
खुशदीप कुमार मल्होत्रा कहते हैं कि पिछले तीन वर्षों से वह उन पुरुषों और महिलाओं, बूढ़े और जवानों के साथ लगातार बातचीत कर रहे हैं जिन्हें यह घटना याद है। चित्ती सिंहपुरा ने नरसंहार के बाद ‘विकास’ देखा है, जैसा कि कई स्थानीय लोग अक्सर कहते हैं। लेकिन दरबारा सिंह (बदला हुआ नाम) कहते हैं कि आप बताएं, सड़कें तो बन ही जानी थीं, लेकिन उनकेपिता की मौत का जवाब कौन देगा?

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