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समलैंगिक विवाह पर SC ने कहा- ‘ये जितना आसान काम दिखता है, उतना है नहीं’

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नई दिल्ली,

सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की याचिकाओं पर सुनवाई का मंगलवार को चौथा दिन रहा. मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देना आसान काम नहीं है. कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने चिंता जताते हुए कहा कि यह मामला इतना आसान नहीं है, जितना दिखाई देता है. कानून बनाना संसद के अधिकार क्षेत्र में है. हमें ये देखना है कि हम कितनी दूर तक जा सकते हैं. इस पर काफी विचार करने की जरूरत है कि समाधान कैसे तैयार किया जाए.

मामले की सुनवाई शुरू करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गीता लूथरा ने कहा कि इससे क्या फर्क पड़ता है कि आप लिव इन रिलेशनशिप में रह सकते हैं या नहीं. मेरी (समलैंगिक) पहचान लिव इन रिलेशनशिप नहीं हो सकती. एक शख्स के तौर पर मेरे स्टेटस का जवाब समानता है. समलैंगिकों को भी बाकी जेंडर की तरह समान तरीके से विवाह करने का अधिकार मिले.

’34 देशों में समलैंगिक विवाह को मान्यता’
लूथरा ने कहा कि यूरोपीय यूनियन (ईयू) सहित जी-20 देशों के 12 देशों में समलैंगिक विवाह को मंजूरी मिली हुई है. दुनिया के 34 देशों में इसे मान्यता दी गई है. दुनिया के हर लोकतांत्रिक और प्रगतिशील देश में समलैंगिक विवाह को मान्यता मिली हुई है. हम पीछे नहीं रह सकते.उन्होंने कहा कि शादी कोई स्टैटिक कॉन्सेप्ट नहीं बल्कि एक रिवॉल्विंग कॉन्सेप्ट है. अल्पसंख्यक एलजीबीटी प्लस समुदाय को भी अधिकार है. वे बेशक अल्पसंख्यक हैं लेकिन बहुसंख्यक किसी भी मायने में अल्पसंख्यकों के अधिकारों का फैसला नहीं कर सकते.

इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने कहा कि अंग्रेजों के शासन से पहले भी समलैंगिक संबंध थे. यहां तक कि पुराणों में भी इसका जिक्र है. इस दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्‍वामी ने कहा कि भारत में संसद पर संविधान से लगाम कसी गई है. हमारे मूल अधिकार बेसिक स्‍ट्रक्‍चर का हिस्‍सा हैं. उन्होंने कहा कि ‘संसद संप्रभु नहीं, संविधान सुप्रीम है’.

मेनका गुरुस्‍वामी ने कहा कि केंद्र सरकार अदालत में यह नहीं कह सकती कि यह संसद का मामला है. जब हमारे अधिकारों का हनन हो रहा है तो अनुच्‍छेद 32 के तहत इस अदालत में आने का अधिकार है. भारत की संसद संविधान से पैदा हुई है, उसकी शक्तियां असीमित नहीं हैं. बता दें कि इस मामले में बुधवार को भी सुनवाई जारी रहेगी.

क्या है मामला?
दरअसल, दिल्ली हाईकोर्ट समेत अलग-अलग अदालतों में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की मांग को लेकर याचिकाएं दायर हुई थीं. इन याचिकाओं में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने के निर्देश जारी करने की मांग की गई थी. पिछले साल 14 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट में पेंडिंग दो याचिकाओं को ट्रांसफर करने की मांग पर केंद्र से जवाब मांगा था.

इससे पहले 25 नवंबर को भी सुप्रीम कोर्ट दो अलग-अलग समलैंगिक जोड़ों की याचिकाओं पर भी केंद्र को नोटिस जारी की था. इन जोड़ों ने अपनी शादी को स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत रजिस्टर करने के लिए अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की थी. इस साल 6 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी याचिकाओं को एक कर अपने पास ट्रांसफर कर लिया था.

याचिकाओं में क्या है मांग?
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 को डिक्रिमिनलाइज कर दिया था. यानी भारत में अब समलैंगिक संबंध अपराध नहीं हैं. लेकिन अभी भारत में समलैंगिक विवाह की अनुमति नहीं मिली है. ऐसे में इन याचिकाओं में स्पेशल मैरिज एक्ट, फॉरेन मैरिज एक्ट समेत विवाह से जुड़े कई कानूनी प्रावधानों को चुनौती देते हुए समलैंगिकों को विवाह की अनुमति देने की मांग की गई है.

– समलैंगिकों की मांग है कि अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने का अधिकार LGBTQ (लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीर) समुदाय को उनके मौलिक अधिकार के हिस्से के रूप में दिया जाए. एक याचिका में स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 को जेंडर न्यूट्रल बनाने की मांग की गई थी, ताकि किसी व्यक्ति के साथ उसके सेक्सुअल ओरिएंटेशन की वजह से भेदभाव न किया जाए.

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