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क्या सरकार के लिए मुश्किल हो गया था जातिगत जनगणना को नजरअंदाज करना, जानिए क्या कहते हैं एक्सपर्ट

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नई दिल्ली

सरकार ने आगामी जनगणना में जातिगत जनगणना को भी शामिल करने का फैसला किया है। भारत में आखिरी बार जनगणना साल 2011 में हुई थी और देश में आखिरी पूर्ण जाति आधारित जनगणना 1931 में ब्रिटिश शासन के दौरान ही कराई गई थी। विशेषज्ञ मानते हैं कि जिस तरह से विपक्ष जाति जनगणना को लेकर सरकार पर हमलावर रहा और अब देश में भी लोगों के बीच यह मुद्दा बन रहा है तो ऐसे समय में सरकार इस फैसले को लंबे समय तक नहीं टाल सकती थी। जातिगत गणना को नजरअंदाज करना अब मुश्किल होता जा रहा था।

लोगों के बीच कई सर्वे कर चुके डेटा ऐक्शन लैब फॉर इमर्जिंग सोसायटीज (DALES) के को-फाउंडर आशीष रंजन ने एनबीटी से बात करते हुए कहा कि यह चुनावी मुद्दा तो बन ही रहा है, बिहार ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों से भी ऐसी मांगें उठ रही हैं। खासकर जिन राज्यों में विपक्ष की सरकारें हैं, वे भी जाति गणना करवाने की बात कर रही थी। विपक्ष लगातार सरकार पर जातिगत जनगणना के लिए दबाव बना रहा था, वहीं क्षेत्रीय दलों के लिए भी यह महत्वपूर्ण साबित होगी। ऐसे में विपक्ष तो सरकार के इस फैसले को अपनी जीत बताएगा ही, साथ ही क्षेत्रीय दल भी बड़ी राहत महसूस करेंगे।

50% से ज्यादा लोग जाति जनगणना के पक्ष में
क्षेत्रीय दलों की राजनीति काफी हद तक जाति और भाषाई आधारित वोट बैंक पर होती है। वह कहते हैं कि DALES टीम ने चार सर्वे किए हैं और हर सर्वे में 50% से ज्यादा लोगों ने जाति गणना के पक्ष में बात कही थी। वहीं सरकार को भी यह लगा होगा कि आगामी जनगणना के साथ अब जाति आधारित गणना भी करवाने का सही समय है। हर 10 वर्ष में होने वाली जनगणना 2021 में होनी थी, जो कोविड के कारण समय पर नहीं हो सकी। अब जब भी जनगणना होगी तो लोगों से उनकी जाति भी पूछी जाएगी। आशीष रंजन कहते हैं कि उन्हें लगता है कि 2026 के आखिर में जनगणना और जाति गणना शुरू होगी और उसके डेटा के आधार पर परिसीमन आयोग बनाया जाएगा। परिसीमन आयोग की सिफारिशों के बाद लोकसभा और राज्यसभी की सीटों में इजाफा होगा।

‘जाति गणना से नीतियां बनाने में मदद मिलती’
विशेषज्ञों का कहना है कि कई राज्यों बिहार, तेलंगाना और कर्नाटक ने जाति गणना करवाई थी और अब जब भी जाति के नए आंकड़ें होंगे तो निश्चित तौर पर एक नई तरीके की पॉलिटिक्स जरूर होगी। डीयू के पॉलिटिकल साइंस के सीनियर टीचर प्रेमचंद का कहना है कि जातिगत जनगणना तो काफी समय पहले ही हो जानी चाहिए थी और इस मुद्दे का चुनावी असर दिखना शुरू हो गया था। वह कहते हैं कि इससे नीतियां बनाने में मदद मिलती है और यह बहुत जरूरी कदम है। 1931 में आखिरी पूर्ण जाति आधारित जनगणना में सभी जातियों के विस्तृत आंकड़े एकत्र किए गए थे। 1951 से केवल अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की ही गणना होती रही है। अब जब जाति गणना होगी तो सामान्य वर्ग और पिछड़ी जातियों की भी गिनती की जाएगी।

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