Tuesday , September 22 2020

मोटर वीइकल बिल पर भारी पड़ रही विपक्षी एकजुटता

नई दिल्ली

लंबे अर्से से संसद की मंजूरी का इंतजार कर रहा मोटर वीइकल बिल पर अब राज्यसभा में विपक्ष की एकजुटता भारी पड़ती नजर आ रही है। इस बिल को लेकर कई गैर-एनडीए दल एकजुट हो गए हैं, जिसकी वजह से अब सरकार को इस बिल को टालना पड़ा है। विपक्षी एकता के दबाव में ही अब सरकार ने तय किया है कि रोड ट्रांसपॉर्ट मिनिस्टर पहले विपक्षी दलों के नेताओं से इस बिल को लेकर चर्चा करेंगे, उसके बाद ही राज्यसभा में इस पर चर्चा होगी। अब यह बिल पर राज्यसभा में अगले सप्ताह चर्चा होने की उम्मीद है।

राज्यसभा में इस बिल को लेकर सरकार के पीछे हटने की वजह यह है कि विपक्षी दलों ने इस बिल के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जताते हुए उस पर संशोधन प्रस्ताव लाने की तैयारी की है। चूंकि विपक्षी एकता के बाद राज्यसभा में सरकार का बहुमत नहीं है, ऐसे में सरकार की चिंता है कि अगर विपक्ष के संशोधन स्वीकार हो गए तो यह बिल कमजोर हो जाएगा। यह बिल लोकसभा में पिछले साल 10 अप्रैल को ही पारित हो गया था लेकिन इसके बाद इस बिल को राज्यसभा ने सिलेक्ट कमिटी को भेज दिया था। अब विपक्ष का तर्क है कि सरकार ने इस बिल में कुछ ऐसे प्रावधान किए हैं, जिनसे राज्यों के अधिकारों का हनन हो रहा है। इसी वजह से ऐसे बिंदुओं पर विपक्ष बदलाव चाहता है।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि अब रोड ट्रांसपॉर्ट मिनिस्टर नितिन गडकरी इस बिल को लेकर आपत्ति करने वाली विपक्षी पार्टियों के नेताओं से बातचीत करके उन्हें मनाने की कोशिश करेंगे या फिर विपक्ष की आपत्तियों को मानकर खुद ही बिल में बदलाव करेंगे।

बिल के चार प्रावधान हैं अड़चन
विपक्ष की इस बिल के चार बड़े प्रावधानों पर आपत्ति है। इनमें सबसे पहला प्रावधान डीलरों को वाहन की रजिस्ट्रेशन पावर देना है। विपक्ष का कहना है कि इससे प्राइवेट कंपनियों को फायदा पहुंचाया जा रहा है। जबकि सरकार का कहना है कि इससे वाहन खरीददारों को ही फायदा होगा और लोगों को वाहन खरीदकर रजिस्ट्रेशन के लिए ट्रांसपॉर्ट अथॉरिटी जाने की जरूरत नहीं होती। इससे सरकारी दफ्तरों में होने वाले करप्शन पर रोक लगेगी।

विपक्ष की दूसरी आपत्ति नैशनल ट्रांसपॉर्ट पॉलिसी पर है, जिसमें इंटर-स्टेट रूटों पर चलने वाली बसों के रूटों को लेकर नियम बनेंगे। विपक्ष का कहना है कि यह राज्यों के अधिकार का मामला है। इससे केंद्र, राज्यों के अधिकारों पर हमला कर रही है। जबकि सरकार का कहना है कि इस पॉलिसी से भी जहां राज्य तैयार होंगे, वहीं बस रूटों का फैसला लिया जाएगा।

तीसरी, आपत्ति डिजिटल पेमेंट पर है। विपक्ष का कहना है कि टैक्सों के लिए इस तरह की व्यवस्था होने से राज्यों को उनके हिस्से की पूरी राशि नहीं मिल पाएगी जबकि सरकार का तर्क है कि इससे लोगों को टैक्स आदि भरने में आसानी होगी और किसी राज्य को नुकसान नहीं होगा। चौथी, आपत्ति नैशनल और स्टेट परमिट की नीति को लेकर है। सरकार का दावा है कि वह चाहती है कि इस मामले में भी वह एकतरफा फैसला नहीं ले रही बल्कि वह राज्यों की सलाह लेकर ही कार्य करेगी।

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