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अटल जी की अंतिम यात्रा को छोड़कर पाकिस्तान क्यों गए सिद्धू?

चंडीगढ़

पूर्व क्रिकेटर और कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू इमरान खान के पीएम पद के शपथग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए पाकिस्तान पहुंच गए है। हर कोई हैरत में है कि कभी खुद को ‘वाजपेयी साब दा सिपाही’ (वाजपेयी साहब का सिपाही) बताने वाले नवजोत सिंह सिद्धू ने उनके अंतिम संस्कार में शामिल न होकर पाकिस्तान जाना मुनासिब क्यों समझा?

सिद्धू शुक्रवार को अटारी बॉर्डर पार कर पाकिस्तान पहुंच गए हैं जहां वह शनिवार को इस्लामाबाद में इमरान खान के शपथग्रहण समारोह में शामिल होंगे। वह साल 2004 का समय था जब इंडो-पाक क्रिकेट सीरीज में कमेंटरी असाइनमेंट पूरा करके सिद्धू पाकिस्तान से इसी अटारी बॉर्डर से होते हुए भारत आए थे। तब उन्होंने उन्होंने बीजेपी में शामिल होने की घोषणा की थी लेकिन चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था।

वह अटल बिहारी वाजपेयी ही थे जिनके एक कॉल पर सिद्धू ने अमृतसर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने का फैसला किया था। यही नहीं इस सीट से छह बार सांसद रह चुके कांग्रेस के रघुनंदन लाल भाटिया को सिद्धू ने हराया भी था। उस समय हर रैली में सिद्धू खुद को गर्व से ‘वाजपेयी साब दा सिपाही’ बताते थे। 2007 अमृतसर लोकसभा उपचुनाव में वाजपेयी ने सिद्धू के समर्थन में अपना आखिरी भाषण दिया था।

मौकापरस्त इंसान हैं सिद्धू
वाजपेयी की अंतिम यात्रा में शामिल होने के बजाय पाकिस्तान जाने के सिद्धू के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए बीजेपी प्रवक्ता राजेश हनी ने आरोप लगाया, ‘वह न केवल सबसे संवेदनहीन हैं बल्कि एक मौकापरस्त इंसान भी हैं। वह इंटरनैशनल मीडिया से मिलने वाले फुटेज को देखते हुए उस तथ्य को भूल गए कि वह वाजपेयी ही थे जो उन्हें राजनीति में लाए थे और आज उनका अंतिम संस्कार था।’

‘सिद्धू को सोचना चाहिए था’
वहीं बीजेपी के नैशनल सेक्रेटरी तरुण चुग ने कहा, ‘सिद्धू को फैसला लेने से पहले दो बार सोचना चाहिए। न सिर्फ वाजपेयी की अंतिम यात्रा के लिए जिन्हें वह अपना राजनीतिक गॉडफादर बताते थे बल्कि पाकिस्तान हमारे जवानों पर जो बॉर्डर कर रहा है, उसका भी ध्यान रखना चाहिए था।’

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