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लखनऊ बम ब्लास्ट केसः विशेष कोर्ट ने सुनाई दो को उम्रकैद की सजा

लखनऊ

कचहरी में हुए बम ब्लास्ट मामले में विशेष अदालत ने दो दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। यह बम ब्लास्ट 2007 में लखनऊ के सिविल कोर्ट परिसर में हुआ था।। कोर्ट ने इस मामले में आजमगढ़ के डॉ. तारीक काजमी और कश्मीर के मोहम्मद अख्तर को दोषी माना था। मंगलवार को दोनों की सजा पर फैसला सुनाया गया। कोर्ट ने दोनों को हत्या के प्रयास, आपराधिक साजिश, देशद्रोह और सरकार के खिलाफ जंग छेड़ने के लिए विस्फोटक जमा करने के मामले में दोषी पाया है।

जेल में लगने वाली विशेष अदालत की जज बबिता रानी ने केस की सुनवाई पूरी करते हुए 23 अगस्त को दोनों आरोपियों को दोषी ठहराया था। उनकी सजा पर फैसले के लिए 23 अगस्त का तारीख रखी गई थी। मंगलवार को जज ने दोषियों को उम्रकैद की सजा दी। हालांकि इस केस के तीन अन्य दोषियों में से खालिद मुजाहिद की ट्रायल के दौरान मौत हो चुकी है। सज्जादुर्ररहमान बरी हो चुका है। वहीं आरिफ उर्फ अब्दुल कदीर अब भी फरार हैं।

सरकारी वकील एमके सिंह के मुताबिक अभियुक्तों के खिलाफ देशद्रोह, आपराधिक साजिश, हत्या के प्रयास, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम व विधि विरुद्ध क्रियाकलाप निवारण अधिनियम के तहत चार्जशीट दाखिल हुई थी।

20 मिनट के अंतराल में हुए थे छह धमाके
बता दें कि 23 नवंबर 2007 को लखनऊ, वाराणसी और फैजाबाद में मात्र 20 मिनट के अंतराल में छह धमाके हुए थे। इसमें 18 लोगों की मौत हुई थी और 86 लोग घायल हुए थे। सबसे पहले तीन धमाके वाराणसी की सिविल कोर्ट और कलेक्ट्रेट परिसर में हुए थे। फिर फैजाबाद में दो विस्फोट हुए और सबसे आखिर में लखनऊ दीवानी न्यायालय में एक विस्फोट हुआ। इस दौरान एक और बम को बम निरोधक दस्ते ने डिफ्यूज कर दिया था।

एक बम को पुलिस ने किया था बरामद
23 नवम्बर 2007 को लखनऊ और फैजाबाद में कोर्ट परिसर में सीरियल ब्लास्ट हुए थे। फैजाबाद में चार लोगों की मौत हुई थी जबकि 32 जख्मी हुए थे। लखनऊ में दोपहर सवा एक बजे दीवानी न्यायालय में बरगद के पेड़ के पास ब्लास्ट हुआ था। एक बम कोर्ट के बाहर साइकल स्टैंड में खड़ी साइकल में लगा मिला था। यह फटा नहीं था, इसे बम निरोधक ने निष्क्रिय कर दिया था। वजीरगंज पुलिस को मौके से बैटरी, टाइमर, साइकल, काला बैग, चिपचिपा केमिकल, लोहे के छर्रे, गरारी, लोहे की पत्ती व अन्य चीजें मिली थीं। एफआईआर वजीरगंज थाने में दर्ज हुई थी। पुलिस ने अलग-अलग पांच चार्जशीट दायर कर कश्मीर के सज्जादुर्ररहमान, मोहम्मद अख्तर, तारिक काजमी, खालिद मुजाहिद और आरिफ उर्फ अब्दुल कदीर को आरोपी बनाया था।

एक आरोपी की कस्टडी में हुई थी मौत
इस मामले में जिन पांच आरोपितों को गिरफ्तार किया गया था, उनमें से आफताब आलम अंसारी के खिलाफ साक्ष्य न मिलने पर उसे 22 दिन में क्लीनचिट दे दी गई थी। सज्जादुर्ररहमान को जेल कोर्ट ने 14 अप्रैल 2011 को बरी कर दिया था। आरडी निमेष आयोग ने 2012 में अपनी रिपोर्ट में तारिक और खालिद की गिरफ्तारी को संदिग्ध मानते हुए दोषी पुलिसवालों पर कार्रवाई की सिफारिश की थी। इस मामले में खालिद की 18 मई 2013 को कस्टडी में मौत हो गई थी। जिसके बाद तत्कालीन डीजीपी विक्रम सिंह, एडीजी लॉ ऐंड ऑर्डर बृजलाल व आईबी अफसरों समेत कई अफसरों पर हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ था।

अब्दुल ने कचहरी में पहुंचाए थे विस्फोटक
साजिश के मुताबिक विस्फोटकों के चार बैग में से एक बैग लेकर तारिक कश्मीरी वाराणसी गया था। वहां उसकी मुलाकात मुख्तार उर्फ राजू से हुई थी। डॉ. तारिक लाल बैग और इमरान कश्मीरी नीले बैग में विस्फोटक लेकर फैजाबाद गए थे। जबकि खालिद मुजाहिद और सज्जाद लखनऊ गए थे। वहां उन्हें अब्दुल ने रिसीव किया। खालिद मुजाहिद और अब्दुल ने ही कचहरी में विस्फोटक लगाए थे।

डॉ. तारिक के क्लीनिक पर रची गई थी साजिश
विभिन्न कोर्ट में आतंकी मामलों की पेशी के दौरान आरोपियों के साथ वकीलों द्वारा मारपीट किए जाने का बदला लेने के लिए अलग-अलग कचहरी में सीरियल ब्लास्ट करवाए गए थे। इसकी साजिश 16 नवंबर 2007 को डॉ. तारिक काजमी की क्लीनिक में की गई थी। इस बैठक में सज्जाद, तारिक कश्मीरी, इमरान कश्मीरी और खालिद मुजाहिद मौजूद थे। सज्जादुर्रहमान उर्फ सज्जाद और मोहम्मद अख्तर उर्फ मोहम्मद तारिक कश्मीरी ने साजिश का ताना-बाना बुना था। एटीएस की पड़ताल के मुताबिक आतिफ अमीन के सहयोगी मोहम्मद सैफ उर्फ मुख्तार ने विस्फोटक का इंतजाम किया था।

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