UP: माया के फैसले से बदला सियासत का रुख

मेरठ

बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती के कांग्रेस से गठबंधन ना करने के फैसले ने अब उत्तर प्रदेश की सियासी तस्वीर पर असर डालना शुरू कर दिया है। अब तक मोदी विरोध के नाम पर गठबंधन और सत्ता में आने का ख्वाब देख रहे विपक्षी दल भविष्य की संभावना के प्रति आशंकित दिख रहे हैं। माना जा रहा है कि अगर कांग्रेस आगामी वक्त में महागठबंधन से अलग होकर चुनाव लड़ती है तो गठबंधन के वोटबैंक पर इसका बड़ा असर पड़ेगा। वहीं मायावती के भी मेगा अलायंस से बाहर होने की स्थिति में पश्चिम यूपी की सहारनपुर, मेरठ, मुरादाबाद और गाजियाबाद जैसी सीटों पर इकट्ठा हो रहे वोटर बटेंगे, जिससे बीजेपी को फायदा होगा।

दरअसल, पश्चिम यूपी में अब तक पीएम मोदी का रास्ता रोकने के लिए बीएसपी, एसपी और आरएलडी के बीच कांग्रेस के नेतृत्व में गठबंधन होने के कयास लगाए जा रहे थे। हालांकि, बुधवार को बीएसपी सुप्रीमो मायावती के ऐलान के बाद महागठबंधन की इस कवायद को अब करारा झटका लगा है। एक ओर जहां महागठबंधन की उम्मीद बांधे विपक्षी दल अब तक कोई ठोस फॉर्म्युला पेश नहीं कर सके हैं, वहीं समझौते की तस्वीर सामने ना आने के कारण इन पार्टियों के नेता भी असमंजस में हैं। कई मुद्दों पर चाहकर भी इन दलों के नेता एक साथ नहीं आ पा रहे हैं। इसी कड़ी में जहां बीजेपी वोट बनाने में युद्ध स्तर पर लगी है वहीं दूसरे दल गठबंधन की संभावना के चलते शांत है। सीट किसके खाते में जाएगी, इस उलझन से कार्यकर्ता वोटरों का पंजीकरण करवाने में भी हिचक रहे हैं।

सत्ता से बाहर कांग्रेस अब भी कई जगह मजबूत
कांग्रेस भले ही 2014 के चुनावों मे आकंड़ों में यूपी में कमजोर दिखती हो लेकिन कई सीटों पर उसकी पकड़ मजबूत है। दरअसल, 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अकेले दम पर 71 सीटों के साथ 42.63 फीसदी वोट हासिल किए थे। एसपी को 22.35 फीसदी वोटों के साथ पांच सीटें मिली थी। बीएसपी को 19.7 फीसदी वोट तो मिले लेकिन सीट एक भी नहीं जीत पाई। इसके उलट कांग्रेस महज 7.53 फीसदी वोट हासिल दो सीटें जीत ले गई थी। साथ ही पार्टी ने सहारनपुर में मजबूत दस्तक दी थी। इसके अलावा पूर्व में गाजियाबाद और मुरादाबाद की लोकसभा सीटों पर कांग्रेस का कब्जा रहा है। ऐसे में एक बड़े वोटर समूह में अपनी पैठ बनाने वाली कांग्रेस अगर बीएसपी से तकरार के बाद अलग से चुनाव लड़ती है तो इसका लाभ बीजेपी को ही होगा।

कांग्रेस का गिरता ग्राफ भी बन सकता है खतरा
कांग्रेस का जनधार लगातार गिरता जा रहा हैं। पार्टी के पास यूपी में मौजूद सात विधायकों में से दो पश्चिम उत्तर प्रदेश से हैं, लेकिन इन सब के बीच करीब तीन दशक से सत्ता से बाहर कांग्रेस संगठन की दृष्टि से काफी कमजोर दिखने लगी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को कुल 7.3 फीसदी वोट मिले थे, लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में यहां आंकड़ा 6.2 फीसदी तक ही रह गया। वहीं बीएसपी और एसपी को इन चुनावों में 2014 की अपेक्षा अधिक वोट मिले। ऐसे में सियासी जानकारों का कहना है कि अगर पार्टी पश्चिम यूपी में एसपी और बीएसपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ती है तो उसके लिए अपना सियासी वजूद बचाना आसान होगा। वहीं अलग चुनाव लड़ने की स्थिति में कांग्रेस को नुकसान जरूर होगा।

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