Thursday , September 24 2020

लोकसभा चुनाव: क्या वोट ट्रांसफर करा पाएंगे अखिलेश-माया?

लखनऊ

आगरा के रहने वाले दलित नेता रविंद्र पारस वाल्मिकी इन दिनों बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं। वाल्मिकी ने करीब 24 साल बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) में गुजारे लेकिन अब उन्‍हें पहली बार अपने भाषण का अंत ‘जय भीम, जय भारत’ से नहीं करना पड़ रहा है। समाजवादी पार्टी के साथ हुए अलायंस का सम्‍मान करने के लिए उन्‍हें अब इसके बाद वाल्मिकी को ‘जय लोहिया, जय समाजवाद’ भी कहना पड़ रहा है।

बीएसपी नेताओं की तरह ही एसपी के नेताओं को भी नारे लगाने पड़ रहे हैं जो समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया को अपना आदर्श मानते हैं। एसपी के नेता और कार्यकर्ता दलितों के आदर्श बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर, कांशीराम और मायावती का नाम लेने के बाद ही भाषण की शुरुआत कर रहे हैं। यह कुछ उसी तरह से है जैसे दोनों ही दलों के झंडे एक-दूसरे से मिल गए हैं।

वोटों का आपस में ट्रांसफर किया जाना बेहद महत्‍वपूर्ण
आपसी मतभेदों को भुलाकर एसपी-बीएसपी के एक साथ आ जाने के बाद एक-दूसरे के आदर्श नेताओं के प्रति स्‍नेह के प्रदर्शन के बीच लाख टके का सवाल अभी भी बना हुआ है। क्‍या वे अपने वोटों (एसपी का यादव और बीएसपी का जाटव) को ट्रांसफर कर पाएंगे या नहीं। हालां‍कि दोनों दलों के बीच दोस्‍ती से अलायंस का विरोध करने वाले शांत हो गए हैं।
करीब दो दशक तक एक-दूसरे के शत्रु रहने वाले दोनों ही दलों के लिए वोटों का आपस में ट्रांसफर किया जाना बेहद महत्‍वपूर्ण हो गया है। यह आश्‍चर्य वाली बात नहीं है कि जब 1995 में मायावती पर एसपी कार्यकर्ताओं के हमले की बात होती है तो वाल्मिकी इसे दिलों का गठबंधन बताते हैं। उन्‍होंने कहा, ‘हम आगे बढ़ गए हैं। वस्‍तुत: यह एक ऐसा गठबंधन है जो जनता के दबाव में हुआ है। हमें एक-दूसरे के महापुरुषों का सम्‍मान करना है।’

यादवों और जाटवों के बीच शत्रुता का इतिहास
दोनों दलों के नेता चाहे जो कहें लेकिन इस ‘सम्‍मान’ को जमीनी स्‍तर पर दिलाना आसान नहीं है। वह भी तब जब सूबे में यादवों और जाटवों के बीच शत्रुता का इतिहास रहा है। इटावा के कोठी बिचारपुरा गांव के जाटव किसान राम दास कहते हैं कि मायावती ने एसपी के साथ गठबंधन करके दलितों की आकांक्षाओं का अपमान किया है। उन्‍होंने कहा, ‘एसपी के शासनकाल में गुंडे खुलेआम घूमते थे। और यदि गुंडाराज वापस आने जा रहा है तो दलित न्‍याय के लिए किसके पास जाएंगे।’

एक दलित बहुल गांव के रहने वाले उपदेश कुमार इससे सहमत हैं। वह कहते हैं, ‘यादव और जाटव की दोस्‍ती आज तक नहीं चल पाई। इस गठबंधन में बहन जी को सबसे ज्‍यादा नुकसान होगा क्‍योंकि अखिलेश यादव को ज्‍यादा सीटें मिलेंगी। जहां हम अपने वोट उन्‍हें ट्रांसफर करेंगे लेकिन उनके वोट हमें नहीं मिल पाएंगे।’ उन्‍होंने स्‍वीकार किया कि वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में कुछ दलितों ने बीजेपी को वोट दिया था।

एसपी को चुनना आग और तवे के बीच चुनना
कुमार कहते हैं कि एसपी को चुनना आग और तवे के बीच चुनना है। वर्तमान सरकार में कम से कम इतना तो है कि यादवों का कोई डर नहीं है। कुमार से इतर कई ऐसे भी हैं जो बीजेपी को हराने के लिए इस महागठबंधन का समर्थन करते हैं। उधर, यादवों की अपनी चिंता है लेकिन सराई इसार गांव के शिशुपाल सिंह कहते हैं कि यह वोटों के ट्रांसफर में आड़े नहीं आएगा।

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