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कृषि विधेयकों पर ममता का हमला- मोदी सरकार के फैसले से पैदा होंगे सूखे जैसे हालात

कोलकाता

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कृषि विधेयकों को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला किया है। उन्होंने कहा कि संसद के दोनों सदनों से पास हुए कृषि विधेयक किसान विरोधी हैं और इनकी वजह से देश के किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) नहीं मिलेगा। ममता ने आगाह किया कि केंद्र सरकार के इस फैसले से देश में सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है।

ममता की पार्टी ने संसद के दोनों सदनों में केंद्र के कृषि विधेयकों का पुरजोर विरोध किया है। सोमवार को खुद ममता बनर्जी ने मोर्चा संभाला और केंद्र के कृषि विधेयकों का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि देश की सभी विपक्षी पार्टियों को साथ मिलकर इन विधेयकों के खिलाफ लड़ना चाहिए। ममता ने कहा, ‘देश जहां कोविड-19 महामारी से जूझ रहा है, केंद्र सरकार इन कृषि विधेयकों के जरिए सूखा लाना चाहती है।’

ममता ने कहा, ‘केंद्र सरकार ने जरूरी चीजों के बढ़ते दाम को कंट्रोल करने के लिए कुछ नहीं किया। मगर किसान विरोधी कानून ले आई। इन विधेयकों से किसानों को एमएसपी नहीं मिलेगा जिससे हमें खाद्य संकट से जूझना पड़ सकता है।’ बता दें कि भारी हंगामे के बीच रविवार को राज्यसभा में दो कृषि विधेयकों को पारित कर दिया गया। इनमें पहला है कृषक उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020 दूसरा है कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन समझौता और कृषि सेवा पर करार विधेयक-2020।

कानून है क्या और क्या होगा इसका काम?
आसान शब्दों में समझें तो इस कानून का उद्देश्य किसानों को अपने उत्पाद नोटिफाइड ऐग्रिकल्चर प्रोड्यूस मार्केटिंग कमिटी (APMC) यानी तय मंडियों से बाहर बेचने की छूट देना है। इसका लक्ष्य किसानों को उनकी उपज के लिए प्रतिस्पर्धी वैकल्पिक व्यापार माध्यमों से लाभकारी कीमत उपलब्ध कराना है। इस कानून के तहत किसानों से उनकी उपज की बिक्री पर कोई सेस या फीस नहीं ली जाएगी।

विपक्षी पार्टियां इसलिए कर रही हैं इन विधेयकों का विरोध
केंद्र के इन विधेयकों का ज्यादातर विपक्षी पार्टियां जमकर विरोध कर रही हैं। उनका तर्क है कि किसान अपनी उपज को पंजीकृत कृषि उपज मंडी समिति (APMC/Registered Agricultural Produce Market Committee) के बाहर बेचते हैं, तो राज्यों को राजस्व का नुकसान होगा क्योंकि वे ‘मंडी शुल्क’ प्राप्त नहीं कर पाएंगे। अगर पूरा कृषि व्यापार मंडियों से बाहर चला जाता है, तो कमिशन एजेंट (आढ़तिए) बेहाल होंगे। इससे भी बड़ी बात यह है, किसानों और विपक्षी दलों को यह डर है कि इससे अंततः न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) आधारित खरीद प्रणाली का अंत हो सकता है और निजी कंपनियों किसानों का शोषण कर सकती हैं।

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