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बिहार में लालू- तेजस्वी के सपने को पलीता लगाएगी कांग्रेस! दिल्ली में हार की हैट्रिक का सहयोगियों पर बैड इफेक्ट

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पटना

दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने हार की हैट्रिक लगाई। इस वजह से बहुतों को लग रहा होगा कि कांग्रेस कमजोर हो गई है। सच यह है कि उसकी ताकत घटी नहीं है। भले वह बीजेपी या एनडीए की दूसरी पार्टियों के मुकाबले कमजोर पड़ जाती है, लेकिन इंडिया ब्लाक की किसी भी पार्टी को हराने की वह कुव्वत जरूर रखती है। दिल्ली चुनाव का सबसे बड़ा सच यही है। अब यह बात इंडिया ब्लॉक की समाप्ति की घोषणा करने वालों या राहुल गांधी के नेतृत्व को चुनौती देने वाले विपक्षी नेताओं को समझ में आ चुकी होगी। तभी तो जम्मू-कश्मीर के सीएम और नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस की दुर्दशा पर टिप्पणी की है- और लड़ो आपस में।

स्लोगन विपक्ष पर फिट
हरियाणा विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने नारा दिया था बंटोगे तो कटोगे। उसके बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने नारा दिया- एक रहेंगे, सेफ रहोगे। हालांकि इन नारों का अभिप्राय हिन्दू वोटरों से था। बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हो रहे अत्याचार के संदर्भ में था। पर, अब ये नारे विपक्षी दलों पर फिट बैठ रहे हैं। लोकसभा चुनाव तक विपक्ष काफी हद तक एकजुट था। इसका लाभ भी इंडिया ब्लॉक को मिला। तीसरी बार कांग्रेस दो अंकों की 99 तक की संख्या पर पहुंची। 10 साल के इंतजार के बाद कांग्रेस को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का मौका मिला। कांग्रेस के नेतृत्व में ही इंडिया ब्लाक ने चुनाव लड़ा था।

कांग्रेस की असलियत
कांग्रेस इस मुगालते में थी कि उसके नेतृत्व के कारण विपक्ष की स्थिति लोकसभा में मजबूत हुई। पर, हरियाणा और महाराष्ट्र हारने के बाद विपक्षी दलों ने महसूस किया कि उनकी ताकत से ही कांग्रेस मजबूत होने का दंभ भर रही है। उसकी असल ताकत तो अपने कल्याण के लिए भी नाकाफी है। उसके बाद से ही इंडिया ब्लाक में कांग्रेस और राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर हुआं-हुआं शुरू हो गया। ममता बनर्जी ने सबसे पहले बम यह कह कर बम फोड़ा कि इंडिया ब्लाक के नेतृत्व के लिए वे पश्चिम बंगाल की अपनी जिम्मेदारियों के बावजूद तैयार है। फिर तो एक-एक कर बाकी विपक्षी नेताओं ने कांग्रेस और राहुल गांधी के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया।

कांग्रेस और आप में टकराव
आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच टकराव नई बात नहीं है। आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की सत्ता से कांग्रेस को बेदखल किया था। तब से यह तीसरा चुनाव है, जब दिल्ली में कांग्रेस शून्य पर आउट हुई है। गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के असहयोग के कारण आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा गंवाना पड़ गया। इंडिया ब्लाक में रह कर भी हरियाणा में दोनों भिड़ गए। बची कसर दिल्ली में दोनों ने एक दूसरे से निकाल ली। दोनों साथ लड़े होते तो भाजपा का इतना शानदार प्रदर्शन शायद नहीं होता।

दिल्ली की हकीकत
कांग्रेस को तकरीबन छह प्रतिशत वोट दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिले हैं। भाजपा और आम आदमी पार्टी की सीटों के बीच फासला भले दोगुने से ज्यादा का है, लेकिन वोटों का फर्क सिर्फ तीन प्रतिशत का है। भाजपा और एक-एक सीट पर लड़ने वाले जेडीयू-एलजेपीआर को साझे में तकरीबन 47 प्रतिशत वोट मिले हैं, जबकि आप की झोली में 44 प्रतिशत वोट पड़े। कांग्रेस के वोट जोड़ दें तो 50 प्रतिशत वोट से अधिक होते हैं। दोनों बंटे नहीं होते तो शायद भाजपा को इतनी बड़ी सफलता नहीं मिलती।

कांग्रेस को हारने-हराने में महारत
कांग्रेस तो नब्बे के दशक से ही हारने का अभ्यास करती रही है। नरेंद्र मोदी के उदय के बाद लोकसभा चुनाव का तीसरा मौका है, जब कांग्रेस दहाई अंकों पर अटकी है। कर्नाटक और तेलंगाना को छोड़ दें तो राज्यों में भी उसका सफाया हो चुका है। अलबत्ता कांग्रेस के खाते में अपने सहयोगियों को हराने की उपलब्धि जरूर दर्ज हो गई है। अभी तक तो हरियाणा और दिल्ली में ऐसा दिखा ही है। सद्बुद्धि नहीं आई तो इस साल होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में भी इस खतरे से इनकार नहीं किया जा सकता। बिहार में राहुल गांधी ने जो रुख अपनाया है, उस पर कायम रहे तो वह महागठबंधन के लिए दिल्ली और हरियाणा जैसा ही साबित हो सकता है।

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