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नीतीश की चुप्पी पर उठने लगे सवाल? क्या 2025 चुनाव में एनडीए के चेहरे से ही संतुष्ट सीएम, जानिए

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पटना

पीएम का पद ठुकरा कर नरेंद्र मोदी का समर्थन करने वाले नीतीश कुमार की राजनीति सवालों के घेरे में हैं। क्या पीएम का पद ठुकराने वाले नीतीश कुमार आखिर पार्टी के सांसदों को मिले ‘अति अप्रभावी’ विभाग मिलने पर चुप क्यों हैं? किंग मेकर की भूमिका वाले नीतीश कुमार संख्या बल के हिसाब से मिलने वाले कम मंत्री पद पर कुछ बोल क्यूं नहीं रहे? क्या नीतीश कुमार ने अपनी भूमिका राज्य तक ही सीमित कर ली है? कुछ ऐसे सवाल हैं, जो लोगों के मन में उठ रहे हैं। मगर, इसका सीधा-सीधा जवाब न तो नीतीश कुमार और ना ही उनकी पार्टी से जुड़ा कोई नेता देने को तैयार है।

कागजी शेर ढेर क्यों?
भाजपा को बहुमत नहीं मिलने पर दो सहयोगी दलों का मान बढ़ता हुआ दिखा। कहा जा रहा था कि अनुभवी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू नरेंद्र मोदी की नकेल कस देंगे। इसके साथ ही नीतीश और चंद्राबाबू दोनों ही अपने-अपने राज्यों की विकास के लिए योजनाओं की गंगा बहाएंगे। अपने संख्या बल के कारण अपेक्षित मदद से ज्यादा सहयोग पाने का दबाव बनाएंगे। खास कर नीतीश कुमार अगले साल राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव में बेहतर प्रदशान की खातिर जनोपयोगी योजनाओं का दबाव बनाएंगे। लेकिन मनचाहा विभाग न मिलने के बाद चुप्पी से गठबंधन में रह कर विरोध करने की सूरत नजर नहीं आती।

सीएम फेस से ही संतुष्ट नीतीश?
तो क्या राज्य में बदलती राजनीतिक परिस्थिति के बीच अमित शाह का इतना कहना भर कि बिहार विधानसभा 2025 का चेहरा नीतीश होंगे, से संतुष्ट हो गए? ऐसा इसलिए कि महागठबंधन में तो सीएम पद का दरवाजा उन्होंने खुद बंद कर दिया है। कई जनसभाओं में नीतीश कुमार ने कहा कि वर्ष 2025 का चुनाव तेजस्वी यादव के नेतृत्व में लडेंगे।

केसी त्यागी के बयान का मतलब
उस खास समय में, जब नरेंद्र मोदी को एनडीए का नेता चुना जा रहा था, तब जदयू के राष्ट्रीय महासचिव और प्रवक्ता का बयान आया कि इंडिया गठबंधन की तरफ से नीतीश कुमार के लिए पीएम का प्रस्ताव आया था। उन्होंने कहा कि अब वे लोग प्रपोजल दे रहे हैं, जिन्होंने नीतीश को इंडिया गठबंधन का संयोजक बनाने से भी इंकार कर दिया था। जेडीयू महासचिव ने कहा कि मुझे खुशी है कि जेडीयू नेतृत्व ने उन्हें अस्वीकार कर दिया और नीतीश कुमार ने नए पीएम के रूप में नरेंद्र मोदी के नाम का समर्थन किया।

नीतीश को 12 में दो मंत्री पद
तब राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा हुई कि केसी त्यागी के बयान का मतलब नरेंद्र मोदी पर दबाव बनाकर ज्यादा मंत्री पद और बेहतर विभाग पा सकें लेकिन परिणाम शून्य रहा। 12 सांसद के साथ बिहार में भाजपा ने चार मंत्री पद लिए और जदयू ने मात्र दो। जहां, रेल मंत्रालय मिलने की चर्चा थी, वहां पंचायती राज और पशुपालन से राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह को संतोष करना पड़ा।

क्या यूसीसी का विरोध कर पाएंगे?
भाजपा के बहुमत नहीं आने की वजह से कहा जा रहा था कि भाजपा अपनी मनमानी नहीं कर पाएगी। अब उनके लिए यूसीसी ला पाना मुश्किल होगा। हालांकि, अमित शाह ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि अगले पांच वर्षों में वे देश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू कर देंगे। इसके लिए 400 पार का नारा भी लगाया था। अब राज्यों से जुड़े इस विषय पर नीतीश कुमार की भूमिका क्या होगी, ये देखना होगा।

दवाब में सीएम नीतीश: बागी
राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की चुप्पी की कई वजहें होंगी। वैसे भी, इधर कम बोल रहे हैं। प्रारंभ के चुनावी सभाओं में तो बोले, मगर बाद में कम ही बोले। हो सकता है स्वास्थ का मसला हो या फिर नरेंद्र मोदी के फैसले से खुश नहीं हों। इस संदर्भ में न तो मंत्रिमंडल को लेकर अतिरेक खुशी व्यक्त की और न ही नाराजगी। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जदयू को रेल, वित्त, स्वास्थ्य और कृषि जैसे विभाग पाने की मंशा थी। इसलिए, जदयू के राष्ट्रीय सचिव केसी त्यागी ने बयान देकर दबाव भी बनाया कि इंडिया गठबंधन की तरफ से नीतीश कुमार को पीएम बनाने का ऑफर आया था। मगर, नरेंद्र मोदी दबाव मुक्त दिखे।

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