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Thursday, March 5, 2026
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देश को रेवड़ी की नहीं जलेबी की जरूरत है… लेकिन दोनों में फर्क क्या है, यह भी समझ लीजिए

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नई दिल्ली

देश में आजकल रेवड़ी कल्चर यानी मुफ्त की सौगात पर बहस गर्म है। इसे लेकर राजनीतिक दलों की अपनी दलीलें हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि इस कल्चर के चलते इकॉनमी को गंभीर नुकसान हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि राज्य सरकारें जिस तरह रेवड़ियां बांट रही हैं, वह टैक्सपेयर्स के हित में नहीं है। इससे देश का नुकसान हो रहा है। इकनॉमिक टाइम्स के कंसल्टिंग एडिटर स्वामीनाथन एस. अलंकेसरिया अय्यर के मुताबिक रेवड़ी और जलेबी में फर्क करने की जरूरत है। देश को मुफ्त में हाई क्वालिटी एजुकेशन, हाई क्वालिटी प्राइमरी हेल्थ और हाई क्वालिटी पब्लिक हेल्थ की जरूरत है। लेकिन किसानों को मुफ्त बिजली, यूरिया और पीएम-किसान जैसी योजनाओं की जरूरत नहीं है।

अय्यर ने ईटी नाउ के साथ इंटरव्यू में कहा कि सबसे अहम सवाल यह है कि आप रेवड़ियों को कैसे परिभाषित करेंगे। सरकार कई इस तरह के खर्च करती है जिसमें जनता से कोई पैसा नहीं लिया जाता है। सरकारें बिना मेरिट के किसी चीज पर बहुत ज्यादा खर्च करती है और बाकी अच्छी चीजों के लिए पैसा नहीं रह जाता है। इसे आप रेवड़ी कह सकते हैं। दूसरी ओर कई और चीजें फ्री हैं। मैं इन्हें जलेबी कहूंगा। हमें इनकी जरूरत होती है। हमें मुफ्त में हाई क्वालिटी एजुकेशन चाहिए। हमें हाई क्वालिटी प्राइमरी हेल्थ चाहिए। हमें हाई क्वालिटी पब्लिक हेल्थ समझिए। इसलिए जलेबी के साथ हमारे यहां बड़ी संख्या में रेवड़ी भी है।

रेवड़ी बनाम जलेबी
उन्होंने कहा, ‘मैं कई चीजों के खिलाफ हूं। उदाहरण के लिए किसानों को मुफ्त बिजली नहीं मिलनी चाहिए। इसके खतरनाक परिणाम हो रहे हैं। एक्विफर्स बर्बाद हो रहे हैं। इसके कारण पंजाब जैसी सरकार दिवालिया हो गई। यह गंभीर समस्या है। हम जरूरत से ज्यादा पानी खींच रहे हैं। हम ज्यादा पानी वाली फसलें उगा रहे हैं। इसी तरह हम किसानों को यूरिया पर भारी सब्सिडी दे रहे हैं। उन्हें वैश्विक कीमतों की एक तिहाई कीमत पर यूरिया दिया जा रहा है। किसान जरूरत से ज्यादा यूरिया का इस्तेमाल करते हैं जिससे जमीन की फर्टिलिटी प्रभावित हो रही है। इतना ही नहीं इस यूरिया को बांग्लादेश और नेपाल को स्मगल किया जा रहा है। या फिर केमिकल इंडस्ट्री को डाइवर्ट किया जा रहा है।

अय्यर ने कहा कि ये ऐसी रेवड़ियां हैं जो नहीं होनी चाहिए। इसी तरह पीएम-किसान का भी कोई मतलब नहीं है। खासतौर पर किसानों को पैसा देने की क्या जरूरत है। अगर आप देना चाहते हैं तो सबको दीजिए। ओडिशा में नवीन पटनायक ग्रामीण इलाकों में सबको पैसा दे रहे हैं। मुझे लगता है कि इसका औचित्य है। केवल किसानों को देना रेवड़ी बांटना है। हर लोकतंत्र में ऐसी लॉबीज होती हैं जो फेवर मांगती हैं। राजनेता अपने वोट बैंक को पक्का करने के लिए उन्हें फेवर करते हैं। यह लोकतंत्र की एक बुनियादी खामी है।

कौन तय करेगा
जब उनसे पूछा गया कि क्या जलेबी है और क्या रेवड़ी यह कौन तय करेगा, अय्यर ने कहा कि यह राजनीतिक दलों और वोटर्स को तय करना है। यह न्यायपालिका या इलेक्शन कमीशन का काम नहीं है। टेक्नोक्रेट्स की कमेटी यह तय नहीं कर सकती है। इस मुद्दे पर इन लोगों की अपनी राय हो सकती है लेकिन आखिरकार यह पॉलिटिकल सिस्टम और राजनेताओं को तय करना है। उन्हें वोटर्स को कनविंस करना होगा कि देश के लिए लॉन्ग टर्म में क्या ठीक रहेगा।

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