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Thursday, March 5, 2026
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SBI छोड़ दो बाकी बैंक बेच दो, पनगढ़िया की सलाह पर RBI का वार, सरकारी बैंकों को बेचना खतरनाक

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मुंबई

केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने पहले से ही सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकतर बैंकों के निजीकरण के संकेत दे दिए हैं। इसके बाद नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया तथा प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य और नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लायड इकोनोमिक रिसर्च की महानिदेशक पूनम गुप्ता के एक पॉलिसी पेपर से भूचाल आ गया। इस पेपर में इन्होंने स्टेट बैंक (SBI) को छोड़ कर अन्य सभी सरकारी बैंकों को बेचने की सलाह दी है। हालांकि देश के केंद्रीय बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया इससे इत्तफाक नहीं रखता।

क्या कहना है रिजर्व बैंक का
आरबीआई (RBI) का कहना है कि ऐसा करने से फायदे से अधिक नुकसान हो सकते हैं। आरबीआई ने अपने एक लेख में आगाह करते हुए सरकार को इस मामले में ध्यान से आगे बढ़ने की सलाह दी है। उसका कहना है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बड़े पैमाने पर निजीकरण से फायदे से अधिक नुकसान हो सकते हैं।

प्राइवेट बैंक का ध्यान प्रोफिट मैक्सिमाइजेशन पर
आरबीआई के बुलेटिन में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि निजी क्षेत्र के बैंक (पीवीबी) लाभ को अधिकतम करने में अधिक कुशल हैं। इसके उलट सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने वित्तीय समावेशन (financial inclusion) को बढ़ावा देने में बेहतर प्रदर्शन किया है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की सबसे सफल योजनाओं में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) शामिल है। इस स्कीम के तहत नागरिकों को केंद्र सरकार की ओर से कई चीजों पर अलग-अलग रूपों में सब्सिडी दी जाती है। इसकी सफलता का श्रेय सरकारी बैंकों को ही जाता है।

कोई नई अवधारणा नहीं
रिजर्व बैंक के लेख में कहा गया है, ‘निजीकरण कोई नई अवधारणा नहीं है और इसके फायदे और नुकसान सबको पता है। पारंपरिक दृष्टि से सभी दिक्कतों के लिए निजीकरण प्रमुख समाधान है जबकि आर्थिक सोच ने पाया है कि इसे आगे बढ़ाने के लिए सतर्क दृष्टिकोण की आवश्यकता है।’ लेख में कहा गया है कि सरकार की तरफ से निजीकरण की ओर धीरे-धीरे बढ़ने से यह सुनिश्चित हो सकता है कि वित्तीय समावेशन और मौद्रिक संचरण के सामाजिक उद्देश्य को पूरा करने में एक ‘शून्य’ की स्थिति नहीं बने।

रिकार्ड बन चुका है
डीबीटी (DBT) योजना की सफलता में सरकारी बैंकों की अहम भूमिका है। इसकी शुरुआत साल 2013 में एक जनवरी को की गई थी। इस स्कीम को लाने का मकसद था पारदर्शिता और सब्सिडी वितरण में होने वाली धांधलियों को रोकना था। भारत में यह स्कीम काफी सफल रही जिसकी वजह से इसे दुनिया की सबसे बड़ी स्कीम के रूप में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में जगह मिली।

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