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पुतिन-जिनपिंग संग ईरान की SCO में जुगलबंदी देगी अमेरिका को टेंशन? पीएम मोदी के सामने चुनौती का पहाड़

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समरकंद

यूक्रेन में भीषण युद्ध और ताइवान को लेकर अमेरिका के साथ जंग जैसे हालात के बीच वॉशिंगटन के धुर विरोधी देश चीन और रूस के शीर्ष नेता उज्‍बेकिस्‍तान के समरकंद शहर में शंघाई सहयोग संगठन की शिखर बैठक में हिस्‍सा लेंगे। कोरोना काल के बाद पहली बार चीन के राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग किसी विदेशी दौरे पर जा रहे हैं। यही नहीं 15 और 16 सितंबर को होने जा रही इस बैठक में अमेरिका का एक और विरोधी देश ईरान एससीओ का सदस्‍य बन सकता है। विश्‍लेषकों का कहना है कि एससीओ शिखर बैठक के बहाने रूस और चीन अमेरिका विरोधियों को एकजुट कर रहे हैं और उनकी तैयारी पश्चिम देशों के खिलाफ शक्ति प्रदर्शन की है। अमेरिका के साथ करीबी रिश्‍ता रखने वाला भारत भी एससीओ का सदस्‍य है और पीएम मोदी भी समरकंद जाने वाले हैं।

पीएम मोदी और चीन के राष्‍ट्रपति के बीच मुलाकात की अटकलें हैं। पुतिन और शी जिनपिंग के बीच बैठक और मोदी और चीनी राष्‍ट्रपति के बीच संभावित बैठक पर दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि चीन एससीओ सम्‍मेलन में ताइवान संकट और यूक्रेन युद्ध के बीच पश्चिमी देशों के खिलाफ एक संयुक्‍त मोर्चा बनाने का प्रयास करेगा। चीन के विदेश मंत्रालय ने इस बात की पुष्टि की है कि राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग मध्‍य एशियाई देशों के दौरे पर जाएंगे। शी जिनपिंग का उज्‍बेकिस्‍तान के अलावा कजाखस्‍तान जाने का भी कार्यक्रम है। इस शिखर बैठक में पुतिन, जिनपिंग, मोदी के अलावा पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और ईरान के राष्‍ट्रपति इब्राहिम रईसी भी हिस्‍सा ले सकते हैं।

एससीओ के 8 सदस्‍य, रूस और चीन का दबदबा
एससीओ की स्‍थापना 15 जून 2001 को हुई थी। इसमें 8 सदस्‍य देश हैं जिसमें चीन, भारत, कजाखस्‍तान, किर्गिस्‍तान, रूस, पाकिस्‍तान, ताजिकिस्‍तान और उज्‍बेकिस्‍तान शामिल हैं। एससीओ में अफगानिस्‍तान, बेलारूस, ईरान और मंगोलिया भी पर्यवेक्षक देश के रूप में शामिल हैं। साल 2021 में यह फैसला लिया गया था कि ईरान को पूर्ण सदस्‍य बनाया जाएगा। इसके अलावा आर्मीनिया, अजरबैजान, कंबोडिया, नेपाल, श्रीलंका, तुर्की, मिस्र, कतर और सऊदी अरब डॉयलाग पार्टनर हैं। एससीओ कई क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दों पर फोकस करता है। इसमें क्षेत्रीय आतंकवाद, जातीय अलगाववाद, धार्मिक अतिवाद और क्षेत्रीय विकास शामिल है। एससीओ के 8 सदस्‍य जिसमें रूस और चीन का दबदबा है, यूरेशिया के 60 फीसदी इलाके आते हैं।

एससीओ के 8 देश दुनिया की कुल आबादी का 40 फीसदी हैं। इसके अलावा दुनिया की कुल जीडीपी का 30 प्रतिशत एससीओ के देशों का है। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका बनाम रूस-चीन की इस जंग में पीएम मोदी को एससीओ की बैठक में तीनों ही देशों के बीच संतुलन बैठना बहुत ही चुनौतीपूर्ण होगा। पुतिन इतने बड़े मंच पर पहली बार होंगे जहां उनके कई दोस्‍त देश होंगे, वह भी तब जब पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों की वजह से रूस दुनिया में अलग-थलग पड़ गया है। अमेरिका के लोवी इंस्‍टीट्यूट के निक ब‍िस्‍ले का कहना है कि यह एक ‘गैर उदारवादी क्‍लब है जिसका महत्‍व बढ़ रहा है।’ उन्‍होंने कहा कि केवल भारत ही इन 8 देशों में असली लोकतंत्र है।

पीएम मोदी के सामने चुनौती का पहाड़
भारत का चीन के साथ सीमा विवाद चल रहा है और गोगरा में चीनी सेना के हटने के बाद शी जिनपिंग और मोदी के बीच मुलाकात की अटकलें तेज हो गई हैं। हालांकि अभी देपसांग और देमचोक को लेकर गतिरोध बरकरार है। इन सबके बीच पीएम मोदी के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने पश्चिमी दोस्‍तों खासतौर पर अमेरिका और रूस-चीन के गठजोड़ के बीच संतुलन बनाने में होगी। पश्चिम देश और रूस और चीन के बीच सिर फुटव्‍वल चल रही है। पुतिन ऐसे समय पर आ रहे हैं जब यूक्रेन में उनकी सेना को करीब 6000 वर्ग किमी इलाके को छोड़कर पीछे हटना पड़ा है। यही नहीं पुतिन के यूक्रेन पर हमले से मध्‍य एशिया के देश जैसे किर्गिस्‍तान, ताजिकिस्‍तान, उज्‍बेकिस्‍तान भी टेंशन में हैं जो सोवियत संघ का हिस्‍सा रह चुके हैं। उन्‍हें अपनी संप्रभुता का डर सता रहा है। एससीओ पहले मध्‍य एशिया पर फोकस किए हुए था लेकिन अब वह श्रीलंका, नेपाल, तुर्की तक पहुंच रहा है जो उसके बदलते लक्ष्‍यों को दर्शाता है।

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