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कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव: आखिर क्यों राहुल-राहुल कर रहे हैं कांग्रेस नेता, समझिए पर्दे के पीछे का ‘खेल’

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नई दिल्ली

कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव में अब एक महीने से भी कम का वक्त बचा है। 3 साल पहले इस पद से इस्तीफा देने वाले राहुल गांधी को फिर से पार्टी की कमान संभालने के लिए मनाने की कोशिशें जारी हैं। उनके न मानने और गैर-गांधी अध्यक्ष की सूरत में फ्रंटरनर माने जाने वाले राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत ‘राहुल राग’ गाने में भी सबसे आगे हैं। सबसे पहले राजस्थान कांग्रेस ने ही शनिवार को राहुल गांधी को अध्यक्ष पद संभालने की मांग करता प्रस्ताव पारित किया। उसके बाद तो जैसे होड़ सी मच गई है। रविवारि को छत्तीसगढ़ और गुजरात कांग्रेस से भी ‘वी वॉन्ट राहुल’ की आवाज गूंज चुकी है। आने वाले दिनों में ये लिस्ट और लंबी हो सकती है ताकि राहुल गांधी पर अध्यक्ष पद संभालने का दबाव बन सके। इसके पीछे रणनीति ये है कि अगर गांधी मान जाते हैं तो अगले महीने होने वाले चुनाव में वोटिंग की नौबत शायद ही आए।

राहुल को मनाने की कोशिश
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को उम्मीद है कि राहुल गांधी पार्टी का नेतृत्व करने के लिए तैयार हो जाएंगे। रविवार को प्रदेश कांग्रेस समिति की बैठक के बाद उन्होंने कहा, ‘छत्तीसगढ़ कांग्रेस प्रदेश कमिटी और राजस्थान पीसीसी पहले ही इस प्रस्ताव को पास कर चुकी हैं। अगर दूसरे राज्यों से भी ऐसा प्रस्ताव आता है तो राहुलजी को इसे लेकर (पार्टी की कमान संभालने की अनिच्छा) पुनर्विचार करना चाहिए। मैं समझता हूं कि राहुलजी कांग्रेस अध्यक्ष बनने के लिए तैयार हो जाएंगे।’

बदल सकता है राहुल का मन: चिदंबरम
इस बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम का कहना है कि राहुल गांधी फिलहाल पार्टी की कमान फिर से संभालने को तैयार नहीं हैं, ‘लेकिन वह अपना मन बदल सकते हैं’। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी चुनाव के लिए आम सहमति सबसे ठीक रहेगा। चिदंबरम ने कहा कि राहुल गांधी अध्यक्ष बने या न बनें, पार्टी में उनका हमेशा महत्वपूर्ण स्थान बना रहेगा।

चुनाव की नौबत आई तो गांधी परिवार के ये भरोसेमंद रेस में
जोर इसी पर है कि किसी तरह राहुल गांधी मान जाए क्योंकि उनके ‘हां’ कहते ही असंतुष्ट नेताओं के समूह ‘G-23’ का शायद ही कोई सदस्य चुनाव लड़ने के लिए आगे आए। हालांकि, कांग्रेस अध्यक्ष के लिए अगर चुनाव की नौबत आई तो गांधी परिवार के कुछ भरोसेमंदों के नाम की अटकलें चल रही हैं। अशोक गहलोत का नाम सबसे आगे चल रहा है। चर्चा तो भूपेश बघेल की भी है। कांग्रेस के ये दोनों ही मुख्यमंत्री राहुल गांधी के नेतृत्व में चल रही ‘भारत जोड़ो यात्रा’ में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। इनके अलावा स्टैंडबाय में मल्लिकार्जुन खड़गे, मुकुल वासनिक, मीरा कुमार, जयराम रमेश और दिग्विजय सिंह के नाम की भी चर्चाएं हैं।

‘राहुल-राहुल’ राग में छिपे 3 मुख्य संदेश
कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव के लिए 24 सितंबर से नॉमिनेशन शुरू होंगे। चुनाव में पीसीसी के पदाधिकारी और पार्टी आलाकमान की तरफ से ‘नामित’ डेलिगेट्स वोट डालते हैं। चूंकि, दो दशक से ज्यादा वक्त से पार्टी की कमान गांधी परिवार के ही हाथ में है लिहाजा डेलिगेट्स की उनमें निष्ठा स्वाभाविक है। पीसीसी की ‘राहुल-राहुल’ राग के जरिए 3 मुख्य संदेश देने की कोशिश की जा रही है। पहला यह कि राहुल गांधी अब भी कांग्रेस में सबसे स्वीकार्य नेता बने हुए हैं। दूसरा- वोटिंग के बजाय आम सहमति के रास्ते पर चला जाए। तीसरा यह कि राहुल गांधी अगर अध्यक्ष पद के लिए मान गए तब तो कोई बात नहीं लेकिन अगर नहीं माने तब भी वह अभी के तरह पार्टी का नेतृत्व करते रहें। यानी ये संदेश कि पार्टी का नेतृत्व करने के लिए उन्हें किसी औपचारिक पद की जरूरत नहीं है, पार्टी उनके हिसाब से ही चलेगी।

‘असंतुष्ट गुट’ को चुनाव लड़ने से रोकने की कोशिश?
प्रदेश कांग्रेस समितियों की ‘वी वॉन्ट राहुल’ कवायद में कांग्रेस के ‘असंतुष्ट’ माने जा रहे नेताओं को चुनाव लड़ने से रोकने की रणनीति भी छिपी है। फिलहाल तो ये रणनीति कामयाब होती भी दिख रही है। शशि थरूर के चुनाव लड़ने की चर्चाएं थीं। अगले हफ्ते से नामांकन शुरू होने वाला है लेकिन अबतक वह अपनी उम्मीदवारी को लेकर कोई फैसला नहीं कर पाए हैं। कांग्रेस में असंतुष्ट नेताओं का गुट नहीं चाहता कि कोई ‘कठपुतली अध्यक्ष’ बनाया जाए। चुनाव कार्यक्रम के ऐलान के बाद जिस तरह आनंद शर्मा, शशि थरूर, मनीष तिवारी, प्रद्योत बोरदोलोई जैसे नेताओं ने डेलिगेट्स की लिस्ट यानी ‘मतदाता सूची’ को सार्वजनिक करने की पुरजोर मांग की, उससे तो यही लगता है कि असंतुष्ट गुट चुनाव मैदान में उतरने को लेकर गंभीर है। ‘मतदाता सूची’ सार्वजनिक करने की मांग को कांग्रेस के सेन्ट्रल इलेक्शन अथॉरिटी चेयरमैन मधुसूदन मिस्त्री सिरे से खारिज कर चुके हैं। अब ‘असंतुष्ट खेमे’ में सन्नाटा जैसा माहौल है। अगले हफ्ते से शुरू होने जा रहे नॉमिनेशन से पहले अगर यह सन्नाटा टूटा तो कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव बेहद दिलचस्प हो सकता है।

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