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आज अंकिता हमारे बीच होती, बदलें यह व्‍यवस्‍था… CM धामी को ऋतु खंडूड़ी का लेटर

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देहरादून

अंकिता भंडारी मर्डर के बाद जब डीएम पौड़ी ने लापरवाही बरतने पर उदयपुर पल्ला-2 के राजस्व उपनिरीक्षक या पटवारी विवेक कुमार को सस्‍पेंड किया तो सबको हैरानी हुई। असल में उदयपुर पल्ला-2 में अंकिता की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवाई गई थी। यहां पहली नजर में लापरवाही की बात सामने आई थी। यह वह क्षेत्र है जहां उत्तराखंड में सामान्‍य पुलिस न होकर राजस्‍व पुलिस व्‍यवस्‍था लागू है। अब इसी को खत्‍म कराने को लेकर उत्‍तराखंड की विधानसभा अध्‍यक्ष ऋतु खंडूड़ी ने सीएम पुष्‍कर सिंह धामी को लेटर लिखा है।

अपने इस लेटर में उन्‍होंने लिखा है, प्रदेश में आज भी कई क्षेत्रों में राजस्‍व पुलिस व्‍यवस्‍था लागू है जिसकी वजह से कानून व्‍यवस्‍था बनाए रखने में परेशानी होती है। ऋतु लिखती हैं, आज के आधुनिक युग में सामान्‍य पुलिस विभाग में पूरे देश में एक राज्‍य से दूसरे राज्‍य में पीड़ित जीरो एफआईआर दर्ज कराकर अपनी शिकायत पंजीकृत करा सकते हैं। वहीं, ऋषिकेश शहर से मात्र 15 किलोमीटर की दूरी पर राजस्‍व पुलिस जिसके पास पुलिस के आधुनिक हथियार और जांच के लिए किसी प्रकार का प्रशिक्षण नहीं है वे जांच कर रहे हैं। यह जानकर अत्‍यंत पीड़ा होती है।

उन्‍होंने आगे लिखा है, गंगा भोगपुर में यदि सामान्‍य पुलिस बल कार्य कर रहा होता तो निश्चित रूप से अंकिता आज हमारे बीच होती और आम जनता में सरकारी कार्यप्रणाली के प्रति इतनी नाराजगी नहीं होती। मैं आपकी आभारी होऊंगी कि प्रदेश में जहां कभी भी राजस्‍व पुलिस की व्‍यवस्‍था चली आ रही है, उसे फौरन खत्‍म कर सामान्‍य पुलिस बल के थाने/चौकी स्‍थापित करने हेतु अविलंब आदेश जारी करने की कृपा करें।

क्‍या है राजस्‍व पुलिस व्‍यवस्‍था
असल में अंकिता जिस रिजॉर्ट में काम करती थी वह गंगा भोगपुर गांव में स्थित था और उदयपुर पल्ला-2 के तहत आता था। यहां राजस्‍व पुलिस व्‍यवस्‍था है जो कि अंग्रेजों के समय से जारी है। उत्तराखंड राज्य का 61 प्रतिशत हिस्सा आज भी ऐसा है, जहां न तो कोई पुलिस थाना है, न कोई पुलिस चौकी। यह इलाका उत्तराखंड पुलिस के क्षेत्राधिकार में भी नहीं आता है। यहा पुलिस का काम राजस्‍व विभाग के कर्मचारी और अधिकारी करते हैं। मतलब पटवारी, लेखपाल, कानूनगो और नायब तहसीलदार जैसे कर्मचारी और अधिकारी ही यहां रेवेन्यू वसूली के साथ-साथ पुलिस का काम भी करते हैं। हालां‍कि, साल 2018 में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने इस व्यवस्था को समाप्त करने के आदेश दिए थे। लेकिन, अभी तक इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

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