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दो बार प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए मुलायम सिंह यादव, तब किसने डाला था अड़ंगा?

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नई दिल्‍ली:

मुलायम सिंह यादव । राजनीति के अखाड़े का पहलवान। सियासत में हमेशा यही इमेज रही है उनकी। वह प्रतिद्वंद्व‍ियों को चित करने के माहिर रहे हैं। उत्‍तर प्रदेश की राजनीति में उन्‍होने वह ऊंचाई हासिल की जो किसी भी नेता के लिए सपना होता है। उन्‍होंने तीन बार राज्‍य की कमान संभाली। देश के रक्षा मंत्री भी बने। हालांकि, प्रधानमंत्री बनने से चूक गए। ऐसा दो बार हुआ। एक बार 1996 में। दूसरी बार 1999 में ऐसा मौका बना था। ‘नन्‍हे नेपोलियन’ ने इस बात को मन में रखा भी नहीं। उन्‍होंने साफ कहा कि वह प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। लेकिन, लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, चंद्र बाबू नायडू और वीपी सिंह के कारण प्रधानमंत्री नहीं बन पाए। चरण सिंह मुलायम को नन्‍हा नेपोलियन कहकर बुलाते थे। जिन नेताजी ने राजनीति में सबको धोबी पछाड़ खिलाई, वह कैसे एक नहीं दो-दो मौकों पर चूक गए, उसकी कहानी भी दिलचस्‍प है।

1996 की बात है। उस समय लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार हुई थी। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के खाते में 161 सीटें आई थीं। अटल बिहारी वाजपेयी ने सरकार बनाने का निमंत्रण स्‍वीकार किया था। वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। यह और बात है कि 13 दिनों के बाद सरकार गिर गई। अब सवाल खड़ा हुआ कि नई सरकार कौन बनाएगा। कांग्रेस के कोटे में 141 सीटें आई थीं। वह खिचड़ी सरकार बनाने के मूड में नहीं थी। तब वीपी सिंह पर सबकी नजरें टिक गई थीं। वह 1989 में मिली-जुली सरकार बना चुके थे। लेकिन, उन्‍होंने प्रधानमंत्री बनने से मना कर दिया। उन्‍होंने तब बंगाल के सीएम ज्‍योति बसु का नाम आगे बढ़ाया था। हालांकि, पोलित ब्‍यूरो ने वीपी सिंह के प्रस्‍ताव को नामंजूर कर दिया।

मुलायम और लालू दौड़ में आए
इसके बाद मुलायम और लालू प्रसाद यादव का नाम प्रधानमंत्री की रेस में सबसे आगे आ गया था। हालांकि, चारा घोटाले में नाम आने के कारण लालू दौड़ से बाहर हो गए। तब सबको एक करने का काम वामदल के बड़े नेता हर किशन सिंह सुरजीत को सौंपा गया था। इसमें वह सफल रहे थे। उन्‍होंने मुलायम के नाम की पैरवी की थी। हालांकि, लालू प्रसाद यादव और शरद यादव ने मुलायम के नाम का विरोध किया था। बाद में देवगौड़ा और आईके गुजराल मंत्रिमंडल में वह रक्षा मंत्री रहे। यह अलग बात है कि प्रधानमंत्री न बन पाने की टीस उनके मन में बनी रही। एक रैली में यह निकल भी गई। उन्‍होंने कहा कि लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, चंद्र बाबू नायडू और वीपी सिंह के चलते वह प्रधानमंत्री नहीं बन पाए।

पर्दे के पीछे हुआ था खेल
तब मुलायम के शपथ ग्रहण तक की तैयारी हो गई थी। लेकिन, अचानक पर्दे के पीछे खेल हो गया। इसमें लालू और शरद यादव ने अड़ंगा लगा दिया। इसके बाद एचडी देवगौड़ा को शपथ दिलाई गई। यह मिली-जुली सरकार थी। यह सरकार भी जल्दी ही गिर गई थी। 1999 में फिर चुनाव हुए। मुलायम सिंह ने संभल और कन्नौज सीट से जीत हासिल की। दोबारा मुलायम सिंह यादव का नाम सामने आया। लेकिन, दूसरे यादव नेताओं ने फिर अपने हाथ पीछे खींच लिए। इस तरह दो बार वह प्रधानमंत्री बनने से बस थोड़ा सा दूर रह गए। बाद में उन्होंने कन्नौज सीट अपने बेटे अखिलेश यादव के लिए छोड़ दी थी। उपचुनाव में अखिलेश पहली बार सांसद बने।

पहलवानी का था शौक
मुलायम सिंह यादव की गिनती भारतीय राजनीति के खांटी नेताओं में होती है। उनका जन्म 21 नवंबर 1939 को उत्तर प्रदेश के सैफई में हुआ। मुलायम अपने पांच भाई बहनों में रतन सिंह से छोटे और अभय राम, शिवपाल, राम गोपाल सिंह और कमला देवी से बड़े थे। उन्‍होंने पहलवानी से अपना करियर शुरू किया। पेशे से अध्‍यापक रहे। उन्‍होंने कुछ समय तक इंटर कॉलेज में अध्‍यापन किया। पिता सुधर उन्‍हें पहलवान बनाना चाहते थे। फिर अपने राजनीतिक गुरु नत्‍थू सिंह को प्रभावित करने के बाद मुलायम ने जसवंत नगर विधानसभा सीट से चुनावी अखाड़े से कदम रखा। मुलायम सिंह यादव तीन बार यूपी के सीएम रहे हैं। वह 1982-1985 तक विधान परिषद के सदस्‍य रहे। उत्‍तर प्रदेश विधानसभा के वह आठ बार सदस्‍य रहे।

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