लखनऊ
उत्तर प्रदेश की राजनीति के दो दिग्गज मुलायम सिंह यादव और कल्याण सिंह वैसे तो राजनीतिक तौर पर धुर-विरोधी माने जाते थे लेकिन इनके बीच दोस्ती भी काफी मजबूत थी। राम मंदिर आंदोलन के समय दोनों नेताओं ने अलग सियासी लाइन पकड़ी और एक हिंदू हृदय सम्राट कहलाया तो दूसरा मुस्लिम समुदाय का हितैषी। टकराव की आंधी ऐसी चली कि यूपी में कल्याण सिंह और मुलायम सिंह यादव सत्ता के दो ध्रुव बन गए। दोनों ही ओबीसी चेहरा थे। मुलायम सिंह यादव दोस्तों के दोस्त माने जाते थे। जरूरत पड़ने पर दोस्त का साथ निभाना उन्हें बखूबी आता था। यही कारण था जब-जब कल्याण सिंह सियासी तौर पर कमजोर हुए, मुलायम सिंह यादव ही थे, जिन्होंने उन्हें सहारा दिया। लेकिन खुद मुलायम सिंह ने बाद में अपने इस कदम को ‘बड़ी गलती’ भी माना और अपनी ही पार्टी से सार्वजनिक तौर पर माफी भी मांगी।
दरअसल उत्तर प्रदेश में भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा माने जाने वाले कल्याण सिंह 1999 आते-आते पार्टी के अंदर विरोध और खेमेबंदी से जूझने लगे थे। अटल बिहारी वाजपेयी और कल्याण सिंह के बीच राजनीतिक खींचतान और मनमुटाव जैसी खबरें किसी से छिपी नहीं थीं। अटल पीएम बन चुके थे और यूपी में कल्याण सिंह के खिलाफ गोलबंदी तेज हो गई। खुद कल्याण सिंह इस गोलबंदी के पीछे अटल का हाथ मानते थे। स्थितियां प्रतिकूल होती गईं और आखिरकार केंद्रीय नेतृत्व के दखल और दबाव के बाद कल्याण सिंह मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए तैयार हो गए। 12 नवंबर 1999 को उन्होंने इस्तीफा दिया और उनकी जगह रामप्रकाश गुप्त को मुख्यमंत्री बनाया गया।
इसके बाद कल्याण सिंह ने अटल बिहारी वाजपेयी को लेकर सार्वजनिक रूप से बयानबाजी शुरू कर दी। इसके बाद बीजेपी शीर्ष नेतृत्व ने कल्याण सिंह को 6 साल के लिए पार्टी से बाहर कर दिया। इस कदम से खफा कल्याण सिंह ने अपने समर्थकों के साथ मिलकर राष्ट्रीय क्रांति पार्टी का गठन किया। साल 2002 के विधानसभा चुनाव में चार सीटें आईं। इसके बाद मुलायम सिंह यादव ने गठबंधन सरकार बनाई तो कल्याण सिंह से दोस्ती काम आई और उनकी पार्टी को भी सरकार में शामिल किया गया। फिर 2004 में कल्याण सिंह ने बीजेपी में वापसी कर ली।
2007 के विधानसभा चुनावों में एक तरफ मुलायम सिंह सपा का चेहरा थे तो बीजेपी ने कल्याण सिंह को आगे किया। लेकिन जीत मायावती की बसपा ने हासिल कर ली। बसपा पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में कामयाब रही, मुलायम विपक्ष में आ गए और कल्याण सिंह एक बार फिर हाशिए पर चले गए। इसके बाद कल्याण सिंह का मोहभंग हुआ और उन्होंने दो साल बाद ही 2009 में पार्टी छोड़ दी। अब वह मुलायम के और करीब आते गए। मुलायम सिंह यादव का कल्याण सिंह के साथ रैली में दिखाई देना, मंच साझा करना खबर बन रही थी। समाजवादी पार्टी में मुलायम के फैसले पर विरोध शुरू हो गया। साफ था पार्टी के नेता कट्टर हिंदुत्व छवि वाले कल्याण सिंह को हजम नहीं कर पा रहे थे। लेकिन मुलायम चुप रहे।
इसके बाद एक बार फिर परिस्थितियां बदलीं और कल्याण सिंह ने 2014 में बीजेपी में वापसी की और कसम खाई कि जिंदगी की आखिरी सांस तक अब बीजेपी का रहूंगा। फिर केंद्र में मोदी सरकार आई और उन्हें राज्यपाल बनाया गया था।
मुलायम वैसे तो अपने किसी मित्र के बारे में कभी कुछ नहीं बोलते थे लेकिन कल्याण सिंह को लेकर उन्होंने जरूर कहा कि उनसे हाथ मिलाना उनकी सबसे बड़ी गलती थी। दरअसल 2016 में पूर्व राज्यसभा सांसद भगवती सिंह के सम्मान समारोह के दौरान मुलायम सिंह यादव ने कहा, ‘मैं स्वीकार करता हूं कि बाबरी ढांचे के विध्वंस के लिए जिम्मेदार नेता से हाथ मिलाना मेरी बहुत बड़ी गलती थी। हमने उनसे हाथ मिलाया था, लेकिन मेरे पास इस बात का नैतिक साहस है कि इस पर अपनी गलती स्वीकार करूं और पार्टी से माफी मांग लूं।’ 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में बाबरी ढांचे के विध्वंस के दौरान कल्याण सिंह यूपी के चीफ मिनिस्टर थे। मुलायम सिंह यादव ने कहा कि कल्याण के साथ मतभेदों के बावजूद उनके रिश्ते बेहतर थे, लेकिन उन्हें शामिल करने से पार्टी में ही दरार की स्थिति हो गई थी। मुलायम ने कहा कि इसकी वजह पार्टी को हुआ नुकसान था, जिसके चलते बाद में मैंने उनसे अपनी रिश्ता खत्म कर लिया।
2009 के आम चुनावों में एसपी सुप्रीमो ने कल्याण सिंह की राष्ट्रीय क्रांति पार्टी से हाथ मिला लिया था, लेकिन अपेक्षित चुनावी सफलता न मिलने के बाद दोनों की राहें अलग हो गई थीं। 2002 में बीजेपी से अलग होने के बाद कल्याण सिंह ने अलग पार्टी का गठन किया था। इसके बाद 2004 में कल्याण सिंह ने एसपी सरकार का गठन किया था, जबकि उनकी करीबी कुसुम राय और बेटे को मंत्री बनाया गया था।
