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जब PAK में हुआ था ऐलान, ‘भारत की प्रधानमंत्री को गोली लगी है, मैच रद्द किया जाता है’

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नई दिल्ली,

31 अक्टूबर 1984. सियालकोट में इंडिया बनाम पाकिस्तान. दूसरा वन-डे मैच. इससे पहले दो टेस्ट ड्रॉ हुए थे और पहला वन-डे इंडिया हार चुका था. सियालकोट के क्रिकेट मैदान के आस-पास कोई भी होटल मौजूद नहीं होता था. टीमों को लाहौर से 2 घंटे की ड्राइव के बाद सियालकोट पहुंचना पड़ता था. इसके लिए मैच की सुबह 4 बजे खिलाड़ी जागते थे, साढ़े-5 तक उन्हें लाहौर से निकलना पड़ता था. मैच के बाद थकान से भरे खिलाड़ी एक बार फिर 2 घंटे की ऊबड़-खाबड़ राइड लेकर लाहौर पहुंचते थे. सुनील गावस्कर की ये भारतीय टीम इस लिहाज़ से काफ़ी किस्मती थी क्यूंकि सियालकोट में कुछ ही वक़्त पहले एक होटल बन खड़ा हुआ था.

मैच शुरू हुआ और इंडिया ने टूर की अपनी सबसे अच्छी परफॉरमेंस शुरू की. हांलाकि पहले दो विकेट्स बहुत ही जल्दी गिर गए लेकिन फिर संदीप पाटिल और कर्नल यानी दिलीप वेंगसरकर ने शानदार बैटिंग शुरू की. दोनों ने 143 रनों की पार्टनरशिप की. इस पार्टनरशिप के दौरान ही स्टेडियम में एक फ़ोन बजा. फ़ोन ज़्यादा होते नहीं थे उस वक़्त और उस नए नए विकसित सियालकोट में बहुत ही कम थे. लेकिन चूंकि सियालकोट के डिप्टी कमिश्नर इस्माइल कुरैशी वहां मौजूद थे इसलिए स्टेडियम में एक फ़ोन इनस्टॉल करवाया गया था. जब फ़ोन कॉल ख़त्म हुई तो कुरैशी की फूंक सरक चुकी थी. उन्हें बताया गया – “भारत की प्रधानमंत्री इंडिया गांधी की गोली मार कर हत्या कर दी गई है. पाकिस्तान के प्रेसिडेंट जनरल ज़िया उल हक़ ने मैच को तुरंत ही निरस्त कर देने का ऑर्डर दिया है.”

इस्माइल कुरैशी सियालकोट के डिप्टी कमिश्नर ज़रूर थे लेकिन मैदान में 25 हज़ार दर्शक बैठे हुए थे जो हर गेंद पर तालियां पीट रहे थे. उन सभी ने मैच देखने के पैसे दिए थे. उनसे ऐसे ही नहीं कहा जा सकता था कि सभी आपने घर जाइए, ये मैच आगे नहीं खेला जाएगा. लेकिन ज़िया उल हक़ की बात न मानना भी महंगा ही साबित होने वाला था. ऐसे में उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा, एक सोफ़े में बैठे और सोचने लगे. बाहर मैच चलता रहा. सियालकोट के स्टेडियम में बड़ी वाली लाइट्स नहीं थीं. ठंड के दिन थे इसलिए दिन छोटे होते थे. वन-डे मैच पूरा हो जाए, इसके लिए मैच को 50 की बजाय 40 ओवर का रखा जाता था. इंडिया के 40 ओवर ख़त्म हुए और 210 रन बने. लंच शुरू हो गया था. वेंगसरकर बिना आउट हुए, 102 गेंदों पर 94 रन बनाकर वापस लौट चुके थे.

इस्माइल कुरैशी को यही सही टाइम लगा. उन्होंने जाकर सुनील गावस्कर और उस वक़्त के टीम मैनेजर राज सिंह डूंगरपुर को सारी बात बताई. सुनील गावस्कर शॉक में चले गए. उनके मुंह से कुछ भी नहीं निकल पाया. इससे पहले की कुरैशी उन्हें बताते कि मैच बंद करने का आदेश दिया गया है, उन्होंने कहा कि वो अपनी टीम को लेकर भारत जाना चाहते हैं. सबसे अंत में रवि शास्त्री और वेंगसरकर को मालूम पड़ा क्यूंकि वो बैटिंग से आने के बाद चेंज करने के लिए चले गए. दोनों के दोनों रोने लगे. वेंगसरकर ने अपने करियर की सबसे बेहतरीन इनिंग्स खेली थी और कुछ ही मिनटों में उन्हें देश की प्रधानमंत्री की हत्या की खबर मिली थी.

जब ये सभी बातें हो रही थीं, खिलाड़ियों और जर्नलिस्ट्स को बाहर ले जाने के लिए स्टेडियम के बाहर गाड़ियां लग चुकी थीं. सामन उनमें लादा जाने लगा.कुरैशी के सामने अब और भी बड़ी समस्या थी – 25,000 सियालकोट वालों को घर भेजना था. मैदान में दंगा विरोधी पुलिस स्टैंड-बाय पर मौजूद थी. इस्माइल कुरैशी ने अनाउंस किया – “भारत की प्रधानमंत्री को गोली लगी है. मैच कैंसिल किया जा रहा है.”

कुरैशी याद करते हैं कि उसके बाद जो हुआ उन्हें विश्वास नहीं होता. सियालकोट डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट असोसिएशन के अध्यक्ष मियां शकूर भी बताते हैं कि दर्शकों के रीऐक्शन ने उन्हें शर्म से भर दिया था. इंदिरा गांधी की मौत के अनाउन्समेंट के बाद दर्शकों ने देर तक तालियां बजाईं. कुरैशी कहते हैं कि अच्छा हुआ उस वक़्त तक प्लेयर्स और पत्रकार जा चुके थे वरना दर्शकों की तालियां इंडिया और पाकिस्तान के उस वक़्त के रिश्तों के लिए अच्छा काम नहीं करतीं.

इंदिरा गांधी पाकिस्तान में काफ़ी पॉपुलर नहीं थीं. सियालकोट भारतीय बॉर्डर के काफ़ी नज़दीक था और वहां के लोगों को दोनों देशों के बीच हाल ही में हुए 65 और 71 के युद्धों के दौरान काफ़ी मुसीबतें झेलनी पड़ी थीं. क्रॉस बॉर्डर ऐक्शन की वजह से उनका जीवन काफ़ी मुश्किल हो चुका था. लिहाज़ा उन्होंने इस तरह से प्रतिक्रिया दी. मदन लाल, जिनकी पैदाइश पंजाब में हुई, कहते हैं कि टीम के सभी लोग डरे हुए थे. लेकिन मदन लाल का डर अलग ही था क्यूंकि दिल्ली एयरपोर्ट पर जब वो उतरे तो बाहर एक भी शख्स दिखाई नहीं दे रहा था. इस्माइल कुरैशी ने बेहद अच्छे तरीक़े से मामला संभाला. उनके प्रयासों से कोई भी अप्रिय घटना नहीं हुई और किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं घटी. इसके चलते उन्हें ख़ूब सराहा गया और 1987 के विश्व कप में उन्हें पाकिस्तान के हिस्से आये मैचों की देखरेख का ज़िम्मा सौंपा गया.

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