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क्या सालाना 64 हजार मौतें भी कम लगती हैं, आखिर सांप काटने के इलाज का पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं कर रही सरकार?

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नई दिल्ली

भारत में हर साल 64 हजार लोग केवल सांप काटने से मर जाते हैं। ये आकंड़ा चौकाने वाले जरूर लगता है, पर एक रिपोर्ट में यह दावा पूरे तथ्यों के साथ किया गया है। ताज्जुब की बात तो यह है कि पूरी दुनिया में सांप काटने से मरने वालों की कुल संख्या का 80 फीसदी भारत से हैं। भारत में जॉर्ज इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल के एक पब्लिक हेल्थ स्पेशलिस्ट डॉ. सौम्यदीप भौमिक ने बताया कि 22 देशों के शोधकर्ताओं के एक ग्रुप की ओर से किए गए एक हालिया अध्ययन के अनुसार, भारत में हर साल 64 हजार से अधिक लोगों की मौत सांप काटने से होती है। यह ग्लोबल स्नैक बाइक से होने वाली मौतों का लगभग 80% हिस्सा है। अध्ययन से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश के बाद मध्य प्रदेश और राजस्थान में सबसे ज्यादा सांप के काटने से मौतें हुई हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि रिपोर्ट न किए गए मामलों के कारण वास्तविक संख्या अधिक होने की संभावना है।

करीब दो हफ्ते पहले 19 अक्टूबर को भारत के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय ने देशभर में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के राज्य कार्यालयों में निगरानी अधिकारियों और मिशन निदेशकों को एक नोटिस भेजा, जिसमें कार्यालयों को एक नोडल नियुक्त करने का निर्देश दिया गया। प्रत्येक राज्य में अधिकारी जो केंद्र सरकार के सर्पदंश रोकथाम और नियंत्रण कार्यक्रम के निष्पादन की देखरेख करेंगे। इस कार्यक्रम के तहत भारत सरकार ने प्रत्येक राज्य में सर्पदंश के उपचार के प्रशिक्षण के लिए फंड भी आवंटित किया है।

दशकों से दुनिया के कई दक्षिणी देशों में सर्पदंश एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या और सार्वजनिक स्वास्थ्य रोग रहा है। इतना ही कि 2017 में डब्ल्यूएचओ ने इसे अपनी श्रेणी ए की उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारी की सूची में शामिल किया है। लेकिन भारत में इसे अभी भी एक खास बीमारी के रूप में शामिल नहीं किया गया है। इसका मतलब है कि देश में इसकी व्यापकता के बावजूद इसे आधिकारिक तौर पर ऐसी बीमारी नहीं माना जाता है जिसकी सूचना सरकारी अधिकारियों को दी जानी चाहिए। पश्चिम बंगाल के पशु चिकित्सक विशाल संतरा कहते हैं, ‘ इसे एक समस्या माना जाता है जिसे राज्य सरकारों को संबोधित करने की आवश्यकता है। यह राष्ट्रीय चिंता का विषय नहीं है।’

क्या कहते हैं एक्सपर्ट
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दे के रूप में सर्पदंश पर उपेक्षा और ध्यान की कमी पीड़ितों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के कारण है। भारत में ज्यादातर सर्पदंश गैर विषैले सांप के होते हैं, क्योंकि उनकी संख्या जहरीले सांपों से अधिक होती है। यहां तक कि जब लोगों को जहरीले सांप काट लेते हैं, तो यह संभावना है कि उन्हें जहर का इंजेक्शन नहीं लगाया जाता, जिसके परिणामस्वरूप रोगी को आमतौर पर जहर से जुड़े किसी भी प्रभाव का अनुभव नहीं हुआ। वहीं जब उपचार की आवश्यकता होती है, तो वे पुराने वैध को पसंद करते हैं।

‘इलाज से पहले सांपों की प्रजातियों को जानना जरूरी’
सांप के काटने के उपचार के क्षेत्र में सांप की प्रजातियां के बारे में नोलेज होना जरूरी है। एक सिद्धांत जो दावा करता है कि दक्षिण एशिया में सांपों की चार प्रजातियां- रसेल वाइपर, सॉ-स्केल्ड वाइपर, चश्मा वाला कोबरा और आम करैत है। इस क्षेत्र के लोगों को सबसे अधिक इन प्रजाति के सांप काटते हैं। लेकिन यह वैज्ञानिक रूप से सही तर्क नहीं था। संतरा बताते हैं, क्योंकि पूर्वोत्तर भारत में पश्चिम बंगाल के मालदा जिले से शुरू होकर ये प्रजातियां नहीं पाई जा सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सांपों के काटने से निपटने के लिए कार्य योजना बनाते समय प्रजातियों के वितरण और सांपों के बीच आनुवंशिक विविधता पर ध्यान देने की कमी नियंत्रण कार्यक्रमों को बेमानी बनाती है।

‘मेडिकल के छात्रों को दी जाती है अधूरी जानकारी’
डॉक्टरों ने कहा कि सांप काटने से होने वाली मौतों की सबसे अधिक संख्या वाला देश होने के बावजूद भारत में इस चिकित्सा समस्या के इलाज के लिए कोई एकैडमिक विशेषज्ञता नहीं है। वह कहते हैं एमबीबीएस के सिलेबस के चौथे सेमेस्टर में मेडिकल के छात्रों ने फोरेंसिक मेडिसिन और टॉक्सिनोलॉजी पर एक किताब पढ़ी होगी, उसमें जानवरों के डंक और जहर को समर्पित एक चैप्टर है। उसमें मेडिकल छात्रों के लिए दी जाने वाली जानकारी की मात्रा बहुत कम है। किसी ने उस सिलेबस का अध्ययन किया है और वह ग्रामीण अस्पताल में तैनात है, लेकिन उसे पता नहीं होगा कि सांप काटने पर रोगी को क्या उपचार देने हैं।

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