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छावला गैंगरेप: क्राइम हुआ, फिर कैसे फांसी से बच गए तीनों, ये 5 वजह बनीं इंसाफ में रोड़ा?

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नई दिल्ली

छावला गैंगरेप-मर्डर केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दिल्ली पुलिस संदेह के घेरे में खड़ी है। एक दशक बाद यह केस उसी शून्य पर आ खड़ा हुआ, जहां पहले दिन था। जिन तीन लोगों को गुनहगार मानकर घिनौनी और नफरतभरी नजरों से देखा जा रहा था, उन्हें देश की सर्वोच्च अदालत से संदेह का लाभ मिल गया। पर, पीड़िता के साथ इंसाफ का क्या? सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि यह साबित नहीं हुआ कि इन तीनों ने ही अपराध किया। पर अपराध तो हुआ और इसमें किसी को संदेह भी नहीं। फिर, कैसे ‘गुनहगार’ फांसी के फंदे से बच गया या बचा हुआ है? पीड़िता के साथ नाइंसाफी का दोषी कौन है, यह अब कैसे, कब और कौन तय करेगा?

​पहचान परीक्षा में ही फेल
आरोपियों के खिलाफ अपराध में संलिप्तता से जुड़े प्रत्यक्ष सबूतों का न होना अभियोजन के केस के लिए सबसे ज्यादा घातक साबित हुआ। परिस्थितियों के सहारे एक मजबूत केस खड़ा करने की पुलिस की कोशिश निचली अदालत और फिर हाई कोर्ट में तो कामयाब रही, पर सुप्रीम कोर्ट की जांच में फेल हो गई। लड़की को जब अगवा किया गया, उस वक्त वह अपनी तीन सहेलियों के साथ थी और इस बीच एक लड़के के साथ किडनैपरों की झड़प होने की बात भी कही गई । पर अहम गवाहों में से किसी ने भी तीनों आरोपियों (राहुल, रवि और विनोद) की पहचान उस शख्स के तौर पर नहीं की, जो अपराध में शामिल था। यहीं से उनकी पहचान संदेह के घेरे में आ गई। ऊपर से पुलिस का शिनाख्त परेड (TIP) न कराना उसी की भूमिका को शक के दायरे में ले आया।

​कॉन्स्टेबल का अदालत में परीक्षण नहीं कराया
अभियोजन के केस को तीसरी चोट उस बीट कॉन्स्टेबल का अदालत में परीक्षण नहीं कराने से लगी, जिनके बारे में कहा गया कि राहुल की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने ही रवि और विनोद को पकड़ा था। इसका नतीजा यह हुआ कि तीनों आरोपियों की गिरफ्तारी से जुड़ी पुलिस की कहानी सुप्रीम कोर्ट की नजर में संदेह से भर गई। रवि की अपने बचाव में दी गई गवाही ने इस शक को और गहरा दिया। उसने कहा था कि पुलिस ने उसे उसके घर से उठाया और जब राहुल(रवि का भाई) उसके बारे में पूछने के लिए थाने पहुंचा तो पुलिस ने उसे भी पकड़ लिया और उनकी कार जब्त कर ली। इन तथ्यों के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जिन परिस्थितियों में आरोपियों की गिरफ्तारी हुई और कार जब्त की गई, वो गंभीर संदेह पैदा करती हैं।

शव को लेकर हरियाणा और दिल्ली पुलिस के ‘विरोधी दावे’
हरियाणा में जिस जगह से मृतक का शव बरामद होने की बात कही गई, वहां सबसे पहले कौन पहुंचा और कब? इस सवाल ने भी अभियोजन के केस को उलझा दिया। हरियाणा पुलिस के मुताबिक, उसके मौके पर पहुंचने से पहले ही दिल्ली पुलिस(छावला थाने के तत्कालीन एसएचओ इंस्पेक्टर संदीप गुप्ता और उनका स्टाफ) वहां मौजूद थी। जबकि, दिल्ली पुलिस का कहना था कि वह राज्य पुलिस को सूचना देने के बाद वहां पहुंची थी।

​शंकाओं से भरे खोजबीन और रिकवरी से जुड़े दावे
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, पुलिस इस बात के ठोस सबूत पेश नहीं कर पाई कि मृतक के शव के पास से बरामद सामान आरोपियों का ही था। पुलिस ने शव के पास से गाड़ी के बंपर का एक लाल रंग का टुकड़ा मिलने का दावा किया था, पर वह यह पुष्ट करने में चूक गई कि वो टुकड़ा राहुल के पास से जब्त की गई गाड़ी का ही था। डीएनए रिपोर्ट का अभियोजन के सपोर्ट में होने के बावजूद उसे इस केस में इसका फायदा नहीं मिला मृतक के शव से आरोपियों के बालों के टुकड़े बरामद होने के पुलिस के दावों पर सर्वोच्च अदालत ने गंभीर संदेह जताया। कारण बताते हुए कोर्ट ने कहा कि शव एक खेत में तीन दिन और दिन रात से खुला पड़ा था। पीड़ित के पिता और पड़ोसियों ने शव की तो पहचान की, पर उसके आसपास से मिले सामान के बारे में कुछ नहीं कहा। लिहाजा, मामले में खोजबीन और चीजों की बरामदगी को लेकर हरियाणा पुलिस, दिल्ली पुलिस के दावों और गवाहों के बयानों में विरोधाभास की वजह से यह केस सुप्रीम कोर्ट के भरोसे को हासिल न कर सका और ‘अनामिका’ का इंसाफ अधूरा रह गया।

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