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8 साल में 8 CEC! निवार्चन आयुक्तों की नियुक्ति में सरकार के रवैये से सुप्रीम कोर्ट नाराज, कह दी बड़ी बात

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नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के मामले में संविधान की चुप्पी और कानून की कमी के कारण (शोषण का) जो रवैया अपनाया जा रहा है, वह परेशान करने वाली परंपरा है। सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने मामले की सुनवाई के दौरान संविधान के अनुच्छेद 324 का हवाला दिया और कहा कि यह अनुच्छेद चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की बात तो करता है, लेकिन नियुक्ति की प्रक्रिया के पर चुप है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस बारे में कानून बनाने पर गौर किया जाना चाहिए था लेकिन 72 साल में ऐसा नहीं किया गया। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने इस प्रक्रिया का शोषण किया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2004 के बाद से कोई भी मुख्य चुनाव आयुक्त छह साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यूपीए के 10 साल के कार्यकाल में छह मुख्य चुनाव आयुक्त बनाए गए जबकि एनडीए के आठ साल के कार्यकाल में आठ मुख्य चुनाव आयुक्त बनाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस केएम जोसेफ की अगुवाई वाली पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने इसे देश के लिए एक परेशान करने वाली परंपरा करार दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- बन गई है गलत परंपरा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चीफ इलेक्शन कमिश्नर की नियुक्ति प्रक्रिया के मामले में संविधान की चुप्पी को किस तरह से शोषित किया गया है, यह साफ-साफ दिख रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस बारे में कोई कानून नहीं है और इस तरह कानूनी तौर पर यह सब सही है। कानून के अभाव में कुछ नहीं किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने उस अर्जी पर सुनवाई के दौरान ये टिप्पणियां कीं जिनमें चीफ इलेक्शन कमिश्नर की नियुक्ति के लिए कॉलिजियम की तरह सिस्टम तैयार करने की मांग की गई है।

खंडित कार्यकाल में भला क्या कर पाएगा CEC!
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यहां तक कि संस्थान के मुखिया के तौर पर चीफ इलेक्शन कमिश्नर का जो खंडित कार्यकाल होता है, उसमें वो कुछ ठोस नहीं कर पाते हैं। 2004 के बाद मुख्य चुनाव आयुक्तों की लिस्ट देखा जाए तो ज्यादातर ऐसे हैं जिनके दो साल से ज्यादा का कार्यकाल भी नहीं है। कानून के मुताबिक, छह साल का कार्यकाल होना चाहिए या फिर 65 साल की उम्र तक का कार्यकाल होना चाहिए। इनमें जो पहले हो जाए, वही कार्यकाल माना जाता है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्यादातर ब्यूरोक्रेट होते हैं और सरकार ऐसे ब्यूरोक्रेट की उम्र पहले से जानती है जिन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया जाता है। उन्हें तब मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर नियुक्त किया जाता है जब वह कभी भी छह साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाते हैं और उनका कार्यकाल खंडित ही रहता है।

सरकार ने दिया संविधान का हवाला
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमानी ने कहा कि मौजूदा प्रक्रिया के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं और उसे गैर-संवैधानिक नहीं कहा जा सकता है। कोर्ट उसे निरस्त नहीं कर सकती है। संविधान सभा ने इसी मॉडल को स्वीकार किया था और ऐसे में शीर्ष अदालत यह नहीं कह सकता है कि इस मौजूदा मॉडल या प्रक्रिया पर विचार की जरूरत है। इस बारे में संविधान में कोई प्रावधान नहीं है जिसकी व्याख्या की जाए। इस दौरान जस्टिस जोसेफ ने कहा कि संविधान को लागू हुए 72 साल हो गाए लेकिन अभी तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है। संविधान सभा चाहती थी कि संसद इसको लेकर कानून बनाए। जो पार्टी पावर में आती है वह पावर में रहना चाहेगी और कुछ भी गलत नहीं लगता है। हमारी नीति लोकतांत्रिक है और लोकतंत्र में चुनाव के जरिए सरकारें बदलती हैं। ऐसे में पारदर्शिता और शुद्धता गहराई से जुड़े हुए हैं और यह संविधान का मूल ढांचा है।

जस्टिस जोसेफ ने कहा- समीक्षा की जरूरत
जस्टिस जोसेफ ने अटॉर्नी जनरल से कहा कि अगर यह संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है तो फिर यह जरूरी है कि कोर्ट इसकी समीक्षा करे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डॉक्टर बीआर आंबेडकर ने संविधान सभा की बैठक में कहा था कि अनुच्छेद 324 आने वाली पीढ़ियों के लिए बड़ा सिरदर्द साबित होगा। अदालत ने अटॉर्नी जनरल से कहा है कि वह कोर्ट को अवगत कराएं कि चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए क्या मेकैनिजम अपनाया जाता है। सुप्रीम कोर्ट मामले में बुधवार को आगे की सुनवाई करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने 23 अक्टूबर 2018 को उस जनहित याचिका को संवैधानिक बेंच रेफर कर दिया था जिसमें कहा गया है कि चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए कॉलिजियम की तरह सिस्टम होना चाहिए।

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