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Friday, April 24, 2026
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आज हमारे पास शिव नहीं हैं, इसलिए सब इधर उधर विष थूक रहे- ‘भगवा बिकिनी’ विवाद पर रत्ना पाठक की दो टूक

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‘साराभाई वर्सेज साराभाई’ फेम एक्ट्रेस रत्ना पाठक शाह इस वक्त गुजराती फिल्म ‘कच्छ एक्सप्रेस’ को लेकर चर्चा में हैं। इस फिल्म में ‘तारे जमीं पर’ एक्टर दर्शील सफारी भी अहम भूमिका में नजर आ रहे हैं। इनके अलावा फिल्म में मानसी पारेख भी हैं। रत्ना पाठक शाह ने अपनी इसी फिल्म को लेकर बातें करते हुए बॉलीवुड के गोल्डन एरा से लेकर फिल्मों को लेकर चलने वाले विवाद पर भी खुलकर बातचीत की।

रत्ना पाठक बोलीं- चाहे मुझे भूखों मरना पड़े, मैं ऐसी चीज नहीं करूंगी
रत्ना पाठक के लगभग हर किरदार महिला सशक्तिकरण की बातें करती हैं। रत्ना पाठक ने कहा, ‘मैं उस तरह के स्क्रिप्ट चुनती हूं जिसके मैं देखना पसंद करूं। मुझे आर्ट को सोशल कॉन्टैक्ट हमेशा क्लियर दिखता है। उसके बगैर आर्ट आर्ट नहीं होता। और चीजें हो सकती हैं, एंटरटेमेंट तो डेफिनेटली है ही। मैं ये जरूर देखती हूं कि फिल्म की कहानी पीछे मुड़ के देखने वाली न हो।। इतनी कन्जर्वेटिव कि जो पहले था वही सब ग्रेट था, इस तरह की बातें करने वाली फिल्म मैं नहीं करूंगी। चाहे मुझे भूखों मरना पड़े, मैं ऐसी चीज नहीं करूंगी।’

औरतों को ऐसे दबा कर रखा जाए वो कैसे गोल्डन ऐज हो सकता है
उन्होंने आगे कहा, ‘क्योंकि मैं मानती हूं कि समाज को हम जहां हैं उससे आगे की सोचनी चाहिए। जो पीछे हुआ है, उसकी बुनियाद पर हम काम कर रहे हैं, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन ये जो गोल्डन ऐड गोल्डन ऐज के पीछे पड़े हुए हैं…उफ्फ तौबा। मेरी मौसी एक बहुत अच्छी बात कहती थीं कि इंडिया का गोल्डन एज अभी आना बाकी है। मैं ये बात मानकर चलती हूं कि इंडिया का गोल्डन ऐज आना बाकी है। ये जो पहले हुआ उसको गोल्डन ऐड नहीं कह सकते। जिस सोसायटी में आधी सोसायटी की औरतों को ऐसे दबा कर रखा जाए वो कैसे गोल्डन ऐज हो सकता है। इसलिए मैं गोल्डन ऐड का इंतजार कर रही हूं जो आनेवाला है।’

‘हमारी फिल्म आई थी लिप्स्टिक माय बुर्का, बहुत तमाशा हुआ था’
रत्ना पाठक ने इन दिनों छोटी-छोटी बातों पर फिल्मों पर होने वाले विवादों पर भी खुलकर बातें कीं। उनसे सवाल किया गया कि इन दिनों फिल्म पठान पर रंगों को लेकर विवाद हो रहा है, इसपर क्या कहेंगी? रत्ना ने कहा, ‘हमारी फिल्म आई थी लिप्स्टिक माय बुर्का, बहुत तमाशा हुआ था, बहुत बवाल हुआ था। विमिन ओरिएंटेड फिल्म है इसलिए इसको बैन कर दिया जाए। इसका कोई मतलब पता है आपको? फिल्म इसलिए बैन हो क्योंकि ये विमिन ओरिएंटेड है। मुझे समझ नहीं आया, खैर ये सारी चीजें होती जाती हैं, समाज को बदलने में बहुत टाइम लगता है और बहुत उथल-पुथल होता है। समुद्र मंथन की कहानी हम सबने सुनी है, उसमें से अमृत निकलता है तो विष भी निकलता है। कोई शिव चाहिए उसे पीने वाला। हमारे पास आज शिव नहीं है, इसलिए हम विष थूक रहे हैं इधर-उधर। पर शिव भी आ जाएगा या हम सब शिव बन जाएंगे। हम इस विष को पचाकर आगे बढ़ेंगे।’

प्रड्यूसर्स के लिए तो बड़ा कठिन होता जा रहा है
पठान को लेकर बढ़ते विवाद पर बातें करते हुए रत्ना ने कहा, ‘अगर हम फिल्मों को लेकर क्रिटिसिज्म करना चाहते हैं, विश्लेषण करना चाहते हैं तो वो करना ही चाहिए। हमारे पास कोई फिल्म क्रिटिक्स नहीं हैं। आधे से ज्यादा पेपर्स कैरी भी नहीं करते कोई रिव्यू, नाटक का तो कोई रिव्यू ही नहीं छपता कभी…तो हमलोग क्रिटिस्जिम से डरते हैं। भारत में ये प्रॉब्लम है। इस माहौल में चीजें बनाना बड़ा कठिन होता जा रहा है, प्रड्यूसर्स के लिए तो बड़ा कठिन होता जा रहा है। हर चीज को लीगली पास करवाना पड़ता है कि इसके बारे में कोई खफा हो जाएगा क्या? इसके बारे में कोई नाराज हो जाएगा क्या? तो यह वो जगह नहीं है जहां आर्ट प्रड्यूस किया जा सके। फिल्में बनेंगी, पैसा भी बनाएंगे लोग मगर अच्छा काम करना जरा कठिन हो जाएगा।’बता दें कि रत्ना पाठक की यह फिल्म 6 जनवरी को रिलीज हो रही है,जिसे लेकर गुजराती फैन्स में काफी उत्साह है। फिल्म सास-बहू के रिश्ते पर एक प्यारी कहानी है, जो सामाजिक संदेश भी देती है।

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