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चेर्नोबिल में आज भी जिंदा हैं कुत्ते, नई स्टडी इंसानों को सिखा सकती है रेडिएशन में बचना

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कीव

इंसानी इतिहास में सबसे भयानक न्यूक्लियर हादसा 1986 में चेर्नोबिल में हुआ था। इस हादसे को 35 साल से ज्यादा का समय बीत चुका है। लेकिन अब यहां मौजूद कुत्तों पर हुई एक स्टडी ने हैरान कर देने वाले खुलासे किए हैं। चेर्नोबिल में जो कुत्ते आज भी जीवित हैं उनके पूर्वज हादसे के समय के पालतू थे। चेर्नोबिल हादसे के बाद भी कुत्ते यहां जीवित हैं और लगातार अपनी आबादी बढ़ा रहे हैं। पूरी दुनिया के वैज्ञानिक मान रहे हैं कि इन कुत्तों पर स्टडी इंसानों को खतरनाक से खतरनाक रेडिएशन वाले इलाकों में रहना सिखा सकती है।

उन्होंने एक ऐसी आबादी की पहचान की है, जो रेडिएशन से बचे रहे और दुनिया भर के अन्य कुत्तों से आनुवंशिक रूप से अलग रहे। साइंस एडवांसेज पत्रिका में शुक्रवार को इससे जुड़ा एक अध्ययन प्रकाशित हुआ। इसमें कहा गया कि बहिष्करण क्षेत्र में 302 कुत्तों को पाया गया जो खुलेआम घूम रहे थे। अध्ययन के कई लेखकों में से एक और नेशनल ह्यूमन जीनोम रिसर्च इंस्टीट्यूट के एलेन ऑस्ट्रैंडर ने कहा, ‘वैज्ञानिकों ने जब इन कुत्तों को देखा तो उनके मन में एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल आया कि आखिर ये 15 पीढ़ियों से इतने कठिन वातावरण में कैसे जिंदा हैं?’

हादसे में मारे गए हजारों लोग
स्टडी के साथी लेखक और दक्षिण कैरोलिना यूनिवर्सिटी में जैविक विज्ञान के प्रोफेसर टिम मूसो ने कहा कि कंटैमिनेटेड पिल्ले सभी स्तनधारियों पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में बता सकते हैं। चेर्नोबिल का पर्यावरण सभी जीवों के लिए अविश्वसनीय रूप से क्रूर है। 26 अप्रैल 1986 को यूक्रेन (तब सोवियत संघ) बिजली संयंत्र में एक विस्फोट हुआ था। इस विस्फोट के कारण भारी मात्रा में रेडियोएक्टिव पदार्थ वातावरण में फैल गया था। इस घटना के कारण तुरंत 30 लोगों की मौत हो गई थी, वहीं बाद में हजारों लोग रेडिएशन से मरे थे।

क्या मिला रिजल्ट
जब हादसा हुआ था तो लोगों को यहां से निकाला जा रहा था। चेर्नोबिल के लोगों को अपने पालतू कुत्तों को यहीं छोड़ कर जाना पड़ा। शोधकर्ताओं का कहना है कि वे जिन कुत्तों का अध्ययन कर रहे हैं, उनमें से ज्यादातर उन्हीं पालतू जानवरों के वंशज हो सकते हैं। एलेन ऑस्ट्रैंडर ने कहा कि अध्ययन के ग्रुप ने पहले सोचा कि कुत्ते इस पर्यावरण में ढल कर सामान्य हो गए होंगे। लेकिन बाद में डीएनए टेस्ट से उच्च, निम्न और मध्यम स्तर के रेडिएशन वाले क्षेत्रों में रहने वाले कुत्तों की पहचान करने में सक्षम थे। उन्होंने कहा, ‘ये हमारे लिए मील का पत्थर था। आश्चर्य की बात है कि हम कुत्तों के परिवारों की पहचान कर सकते हैं।’ अब शोधकर्ता इस बात का पता लगाने में जुटे हैं कि आखिर रेडिएशन ने उन पर किस तरह का प्रभाव डाला।

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