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Wednesday, April 1, 2026
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कमलनाथ बनेंगे कांग्रेस के हनुमान? राजस्थान से कर्नाटक और छत्तीसगढ़ तक कलह से जूझ रही पार्टी को खल रही संकटमोचक की कमी

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भोपाल

राजस्थान में कांग्रेस पार्टी का अंदरूनी कलह एक बार फिर चरम पर है। सचिन पायलट अपनी ही सरकार के खिलाफ उपवास कर चुके हैं। वे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर पूर्ववर्ती बीजेपी सरकार के भ्रष्टाचार के मामलों को दबाने का आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस नेतृत्व पसोपेश में है। उसे समझ नहीं आ रहा कि पायलट के खिलाफ क्या कार्रवाई करे। ऐसे में मतभेद सुलझाने की कमान मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने संभाली है। कमलनाथ अब गहलोत और पायलट के बीच मतभेद सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। समस्या यह है कि कांग्रेस की मुश्किलें राजस्थान तक ही सीमित नहीं हैं। छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी कमोबेश हालात ऐसे ही हैं। कांग्रेस नेतृत्व अब कमलनाथ से उम्मीदें लगाए बैठा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या वे पार्टी के संकटमोचक बन पाएंगे।

पायलट और वेणुगोपाल से मुलाकात
कमलनाथ ने गुरुवार को दिल्ली में सचिन पायलट और पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल से मुलाकात की। उन्होंने गहलोत और पायलट गुटों के बीत मतभेदों को सुलझाने के तरीकों पर चर्चा की। पायलट ने इस दौरान उन्हें बताया कि उनका उपवास पार्टी के खिलाफ नहीं था, लेकिन उनके साथ दोहरा मापदंड अपनाया जा रहा है।

पहले भी उठा चुके हैं जिम्मेदारी
कमलनाथ इससे पहले भी पार्टी के अंदरूनी मुश्किलों को सुलझाने में मध्यस्थ की भूमिका निभा चुके हैं। दिसंबर 2020 में जब कांग्रेस नेतृत्व संकट से जूझ रही थी और असंतुष्ट नेताओं के जी23 गुट ने गांधी परिवार को सीधे चुनौती दी थी, तब कमलनाथ एक्टिव हुए थे। उनके प्रयासों से ही सोनिया गांधी असंतुष्ट नेताओं से मिलने को राजी हुई थीं। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली एमवीए सरकार के संकट के दौरान भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी।

गांधी परिवार के विश्वस्त
कमलनाथ गांधी परिवार के विश्वासपात्रों में शामिल हैं। उन्हें सोनिया गांधी का विश्वास हासिल है तो राहुल-प्रियंका भी उन पर भरोसा करते हैं। पार्टी में हर स्तर पर नेताओं से उनके अच्छे संपर्क हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि करीब तीन साल पहले अहमद पटेल की मौत के बाद से ही कांग्रेस को एक संकटमोचक की तलाश है।

चुनौतियां भी कम नहीं
कांग्रेस नेतृत्व को उम्मीद है कि कमलनाथ पार्टी में अहमद पटेल की खाली जगह भर सकते हैं, लेकिन इसमें कई चुनौतियां भी हैं। लगातार हारों से पार्टी के अंदर एक निराशा का माहौल है। असंतुष्ट नेता पार्टी नेतृत्व पर भी खुलेआम अंगुली उठाने से परहेज नहीं करते। पार्टी में गांधी परिवार के कमांड की स्वीकार्यता भी पहले जैसी नहीं रही।

कहां-कहां संभालेंगे कमलनाथ
सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि कमलनाथ एक साथ कितने मतभेदों को सुलझा सकते हैं। राजस्थान में पायलट ने तेवर कड़े किए तो छत्तीसगढ़ में टीएस सिंहदेव भी आंखें दिखाने लगे हैं। कर्नाटक में पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार खुलेआम एक-दूसरे को चुनौती दे रहे हैं। दोनों विधानसभा चुनाव में अपने समर्थकों को ज्यादा से ज्यादा टिकट देने के लिए दबाव बना रहे हैं। हालत यह है कि उनके झगड़े के चलते पार्टी अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित नहीं कर पा रही। मध्य प्रदेश में भी इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन सबके बीच कमलनाथ मतभेदों को सुलझाने के लिए कितना समय निकाल पाएंगे, यह भी एक बड़ा सवाल है।

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