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कांग्रेसयुक्त भारत में नरेंद्र मोदी के बरक्स राहुल गांधी ही चेहरा बनेंगे, कर्नाटक ने तय कर दिया

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देश का पॉलिटिकल मैप बदलने वाला है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों ने इसे तय कर दिया है। बीजेपी भारत के मानचित्र पर कांग्रेसमुक्त अभियान चला रही थी, उसके उलट आपको कई स्पॉट दिखेंगे। कांग्रेस के शासन वाले राज्यों के स्पॉट। कर्नाटक उसमें जुड़ने जा रहा है। राजस्थान, छत्तीसगढ़, हिमाचल में कांग्रेस अपने बूते सरकार चला रही है। बिहार में भी महागठबंधन की सरकार है। इसमें कोई दो राय नहीं है कांग्रेस ने बढ़त हासिल कर ली है। कर्नाटक ने 2024 की तैयारी में लगी भारतीय जनता पार्टी को सेटबैक दिया है। अब देखना है कि कांग्रेस इस साइकोलॉजिकल गेम में कब तक बढ़त बनाए रखती है।

अब सवाल है कि बीजेपी के खिलाफ जो महागठबंधन बनाने की कवायद चल रही है। उसे लीड कौन करेगा। के चंद्रशेखर राव और ममता बनर्जी तीसरे मोर्चे की तरफ बढ़ रहे थे या कांग्रेस को छोटी क्षेत्रीय पार्टियों के गुट के मुताबिक चलाने की कोशिश कर रहे थे। नीतीश कुमार सबको एक करने की मुहीम चला रहे हैं। हालांकि नवीन पटनायक ने पहला झटका दिया है। ये कह कर कि बीजू जनता दल अकेले ही लोकसभा चुनाव लड़ेगी। लेकिन कर्नाटक की जीत से तय हो गया है कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्षी चेहरे के चयन की बात आएगी तो इसमें राहुल गांधी एक कदम आगे निकल गए हैं।

राहुल की पदयात्रा
भले ही कर्नाटक में मेहनत डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया ने की हो, प्रियंका भी गई थीं। राहुल गांधी की जो पदयात्रा रही, उसको कांग्रेस दूर तलक ले जाएगी। हिमाचल इलेक्शन के समय भी बीजेपी ने राहुल की पदयात्रा का माखौल उड़ाया लेकिन कांग्रेस जीत गई। बीजेपी ने उस पदयात्रा को जिस तरह से कमतर समझा, वह उतना कमजोर नहीं था। राहुल गांधी ने खुद ही कहा कि अब वह पप्पू नहीं हैं। हालांकि उसपर हंसी मजाक भी हुए। उनके कहने के तरीके पर जोक्स बने। लेकिन लगता है राहुल गांधी फेस लिफ्ट हो चुका है। भले ही वह 50 से ज्यादा की उम्र के हो चुके हैं।

पार्टी में गांधी परिवार के प्रति जो लॉयलिटी है उसको देखते हुए राहुल गांधी को पीएम नरेंद्र मोदी के सामने एक चेहरा बनाने की कोशिश की जाएगी। कर्नाटक की जीत के बाद जो कुछ अंदरुनी आवाज है, जैसे कांग्रेस के भीतर ग्रुप ऑफ 23 भी था, वह और भी कुंद हो जाएगा। केंद्र की राजनीति में राहुल गांधी परोक्ष रूप से मजबूत होकर उभरेंगे। कांग्रेस ने एक सुधार किया है कि उन्होंने राज्य के चुनाव को स्थानीय नेतृत्व पर छोड़ दिया है। इंदिरा निरंकुश होने से पहले यही करती थीं। यह बात कांग्रेस को पहले समझ लेना चाहिए था। अभी तक 10 जनपथ से सारी चीजें तय करते थे, इसे कांग्रेस ने बदल दिया है। उदयपुर चिंतन शिविर का असर पार्टी में दिखाई दे रहा है।

कर्नाटक में चुनाव प्रचार के लिए सोनिया गांधी भी गईं लेकिन स्टेट लीडरशिप का रोल हमेशा ऊपर रहा। यह एक अच्छी बात है। मुझे लगता है कि इसका फायदा कांग्रेस को फायदा मिला। इसका फायदा केंद्र की राजनीति में मिलेगा। अब अगर सिद्धारमैया सीएम बनते हैं, तो जो कर्नाटक की लीडरशिप राहुल गांधी को बैक करेगी। इसलिए लगता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले केंद्र की राजनीति में कांग्रेस मजबूत ताकत के रूप में उभरेगी। बीजेपी लाख कोशिश कर ले, जिस तरीके से पूरी की पूरी सेंट्रल लीडरशिप वहां मौजूद थी, सारे स्टेट के वोट खिंचाऊ नेता चाहे वह योगी आदित्यनाथ हों, चाहे हेमंत बिस्वशर्मा हो, सब मौजूद रहे। कट्टर हिंदुत्व को उन्होंने बेचने की कोशिश की। वह सफल होता नहीं दिख रहा है। कांग्रेस ने अपनी तरफ से एक गलती की, अपने मैनिफेस्टो में बजरंग दल को बैन करने की और PFI के बराबर उसकी तुलना की। उसको बजरंगबलि के अपमान तक ले जाने की जो कोशिश हुई जिसमें खुद प्रधानमंत्री शामिल रहे। लेकिन कर्नाटक की जनता ने इस फालतू मुद्दों पर ध्यान ही नहीं दिया।

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