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मुस्लिम, दलित, ईसाई… सबको साधा, 2024 से पहले कर्नाटक में कांग्रेस की सोशल इंजीनियरिंग

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बेंगलुरु

सिद्धारमैया ने शनिवार को कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली उनके साथ डीके शिवकुमार ने भी मंत्री पद की शपथ ली जो राज्य के डिप्टी सीएम बनाए गए हैं। इन दोनों के साथ ही 8 मंत्रियों ने भी शपथ ग्रहण किया। कर्नाटक में कांग्रेस की शानदार जीत के पीछे इस बार सोशल इंजीनियरिंग का वह फॉर्मूला था जिसको लेकर पार्टी आगे बढ़ रही थी। उसी सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले की छाप आज मंत्रिमंडल में भी देखने को मिली। जिन 8 मंत्रियों ने शपथ ली है उनमें कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष जी परमेश्वर, लिंगायत नेता एम बी पाटिल और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे प्रियंक खरगे भी शामिल हैं। परमेश्वर और प्रियंक दलित समुदाय से आते हैं।

जिन मंत्रियों ने शपथ ली उनमें एच मुनियप्पा, के जे जॉर्ज, सतीश जारकीहोली, रामालिंगा रेड्डी और बी जेड जमीर अहमद खान भी शामिल हैं। मुनियप्पा भी दलित समुदाय से आते हैं। वहीं, खान और जॉर्ज का संबंध अल्पसंख्यक समुदाय से है। जारकी होली अनुसूचित जनजाति समुदाय से आते हैं, जबकि रामालिंगा रेड्डी का संबंध रेड्डी जाति से है।

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया कुरुबा समुदाय से ताल्लुक रखते हैं और डिप्टी सीएम शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं। कांग्रेस विधायक दल की गुरुवार को हुई बैठक में सिद्धारमैया को औपचारिक रूप से नेता चुन लिया गया था, जिसके बाद उन्होंने राज्यपाल के समक्ष सरकार बनाने का दावा पेश किया था।

सिद्धरमैया के सामने पहली चुनौती थी सही संतुलन के साथ मंत्रिमंडल के गठन की, जिसमें सभी समुदायों, धर्म, वर्गों और पुरानी और नई पीढ़ियों के विधायकों का प्रतिनिधित्व हो। सिद्धारमैया ने पहली चुनौती सफलतापूर्वक पूरी कर ली है। कर्नाटक मंत्रिमंडल में मंत्रियों की स्वीकृत संख्या 34 है आगे जल्द ही मंत्रिमंडल का विस्तार होने की संभावना है।

कर्नाटक में इस बार कांग्रेस की सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला पूरी तरह कामयाब रहा। कांग्रेस का इस बार कर्नाटक में खास फोकस दलित, अल्पसंख्यक और ओबीसी पर था। कांग्रेस इस चुनाव में इसको साधने में पूरी तरह सफल भी हुई। इसकी छाप शनिवार को शपथ ग्रहण समारोह में भी दिखी। मंत्रियों को देखें तो सिद्धारमैया ने पूरी तरह से इसको साधने की कोशिश की है।

कर्नाटक राज्य कांग्रेस और खासकर डीके शिवकुमार की इस बार पूरी कोशिश थी कि चुनाव लोकल मुद्दे पर ही हो। कर्नाटक में जीत का फॉर्मूला जो इस बार आजमाया गया पार्टी उसे 2024 के चुनाव में भी आजमाने की तैयारी है। दलित, अल्पसंख्यक और ओबीसी पर पार्टी का जोर था। टिकट बंटवारे में भी इस बार इसका खास ध्यान रखा गया था।

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