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विपक्षी एकता के आस्तीन में ‘कुंडली’ मारकर बैठे केजरीवाल, AAP के सियासी पैंतरे से कांग्रेस और नीतीश हैरान

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पटना

विपक्षी एकता मिशन में जिन डेढ़ दर्जन दलों के नेता शामिल हुए, उनमें आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल भी हैं। केजरीवाल की पार्टी की सरकार दिल्ली के अलावा पंजाब में भी है। आप (AAP) अब राष्ट्रीय पार्टी भी बन गई है, इसलिए उसका व्यवहार भी सामान्य पार्टियों की तरह नहीं हैं। यही वजह है कि ममता बनर्जी विपक्षी एकता के लिए केजरीवाल से बात करती हैं तो अब नीतीश कुमार भी उन पर अधिक भरोसा कर रहे हैं। हालांकि केजरीवाल खरबूजे की तरह रंग बदलते रहे हैं। उससे तो यही लगता है कि वे विपक्षी एकता को आगे बढ़ाने से अधिक उसे पीछे धकेलने की कोशिश में लगे हैं। लगातार वे खरबूजे की तरह रंग बदल रहे हैं। नई-नई शर्तें थोप रहे हैं। उनकी शर्तों और आम आदमी पार्टी के बयानों से लगता है कि कांग्रेस से केजरीवाल को सर्वाधिक चिढ़ है। कांग्रेस ने उन्हीं के अंदाज में उनके साथ बर्ताव भी अब तक किया है।

एक स्टैंड पर कायम नहीं रहते अरविंद केजरीवाल
अरविंद केजरीवाल के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे विपक्षी एकता के समर्थक तो हैं, लेकिन कांग्रेस का नेतृत्व मन से वे स्वीकारने को तैयार नहीं। बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने विपक्षी एकता मिशन के तहत पहली बार केजरीवाल से तब मुलाकात की थी, जिस दिन कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी से वे मिले थे। केजरीवाल ने विपक्षी एकता के लिए हामी भरी, लेकिन हफ्ते भर के अंदर ही उनकी पार्टी के महासचिव संदीप पाठक ने बयान दे दिया कि लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी किसी दल या गठबंधन के साथ नहीं जाएगी। देश भर में पार्टी अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ेगी। इसी तरह आप ने एक और शर्त कांग्रेस के सामने रखी थी। आप ने कहा था कि कांग्रेस दिल्ली और पंजाब आम आदमी पार्टी के लिए छोड़ दे तो वे राजस्थान और मध्य प्रदेश में अपने उम्मीदवार नहीं उतारेंगे।

केजरीवाल ने रखी है अध्यादेश पर समर्थन की शर्त
इस बीच दिल्ली सरकार के अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग का अधिकार राज्य सरकार से छीनने का अध्यादेश केंद्र सरकार ने जारी कर दिया। पूर्व में भी अध्यादेश वाली ही व्यवस्था थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार की अपील पर एलजी से यह अधिकार दिल्ली सरकार को दे दिया था। केंद्र के अध्यादेश के खिलाफ अरविंद केजरीवाल ने विपक्षी दलों से सहयोग मांगा। जिस तरह विपक्षी एकता के लिए विपक्षी नेताओं से मिल कर उन्हें राजी करने का प्रयास नीतीश कुमार ने किया, ठीक उसी तर्ज पर केजरीवाल ने भी ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, हेमंत सोरेन, शरद पवार और उद्धव ठाकरे से मिल कर अध्यादेश के खिलाफ सहयोग मांगा। केजरीवाल के साथ खड़े रहने की सबने हामी भी भरी। इसके साथ ही केजरीवाल ने कांग्रेस नेताओं से भी मिलने का समय मांगा। पर, राहुल गांधी उनकी बात सुने बगैर विदेश यात्रा पर निकल गए तो खरगे ने कोई जवाब ही नहीं दिया।

आप का साथ नहीं चाहते दिल्ली-पंजाब के कांग्रेसी
अरविंद केजरीवाल से कांग्रेस नेताओं के न मिलने की बड़ी वजह यह बताई जाती है कि दिल्ली और पंजाब के कांग्रेसी नेता उनके साथ कोई संबंध नहीं रखना चाहते। अजय माकन, संदीप दीक्षित जैसे दोनों राज्यों के कई नेताओं ने राहुल और खरगे से मुलाकात में अपनी राय स्पष्ट कर दी थी। दरअसल दोनों ही राज्यों में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस से सत्ता छीनी है। इसलिए केजरीवाल से उनकी खुन्नस है। आखिरकार अपने नेताओं की सलाह मानते हुए कांग्रेस ने कह दिया कि अध्यादेश पर वह आप का साथ नहीं देगी

अरविंद ने पत्र लिख कर अध्यादेश की शर्त दोहराई
पटना में नीतीश कुमार की मेजबानी में 23 जून को विपक्षी दलों की बैठक थी। ठीक एक दिन पहले केजरीवाल ने विपक्षी दलों को चिट्ठी लिखी, जिसमें केंद्र सरकार के सेवा अध्यादेश पर आप के साथ खड़े होने की अपील की। उन्होंने यह भी खतरा बताया कि जिस तरह आज दिल्ली के साथ केंद्र सरकार सलूक करती है, उस पर विपक्ष ने लगाम नहीं लगाया तो यह स्थिति सभी विपक्ष शासित राज्य सरकारों के साथ आएगी। बीजेपी सरकार ने दिल्ली से यह प्रयोग शुरू किया है। केजरीवाल का आशय साफ था कि अगर विपक्ष ने साथ नहीं दिया तो उन्हें विपक्षी एकता से कोई सरोकार नहीं रहेगा। विपक्षी दलों को लिखी चिट्ठी में केजरीवाल ने कहा कि विपक्षी दलों की बैठक में सभी पार्टियां इस पर स्टैंड क्लीयर करें और संसद में अध्यादेश के खिलाफ रणनीति बनाई जाए। अध्यादेश अगर लागू हो गया तो दिल्ली में जन तंत्र नहीं बचेगा। जनता जिसकी भी सरकार चुने, उसका कोई मतलब नहीं रह जाएगा।

पटना में दिखा केजरीवाल का सबसे अलग अंदाज
विपक्षी बैठक में अपने चार साथियों के साथ केजरीवाल पटना आए तो उन्होंने बैठक में भी अध्यादेश का मुद्दा उठाया। कांग्रेस ने तो कोई टिप्पणी ही नहीं की और दूसरे दलों ने सिर्फ इतना ही कहा कि अध्यादेश जब आएगा, तब इसे देखा जाएगा। हां, यह सहमति जरूर बनी कि केंद्र के किसी भी एजेंडे का विपक्ष सामूहिक तौर पर विरोध करेगा। केजरीवाल का मानना था कि राज्यसभा में विपक्षी सदस्यों की संख्या सत्ता पक्ष से अधिक है। विपक्ष एकजुट होकर विरोध करे तो अध्यादेश पास नहीं हो पाएगा। विपक्षी एकता की परीक्षा भी इसी बहाने हो जाएगी। खैर, केजरीवाल विपक्ष के रुख से संतुष्ट नहीं दिखे। उनकी नाराजगी इसी से उजागर हुई कि साझा प्रेस कांफ्रेंस में वे शामिल नहीं हुए। बैठक से निकल कर सीधे एयरपोर्ट के लिए निकल गए।

केजरीवाल की नई शर्त- राहुल पर दांव न लगाएं
अरविंद केजरीवाल की अब एक नई शर्त सामने आई है। उन्होंने कहा है कि गोलबंद विपक्ष राहुल गांधी के चेहरे पर तीसरी बार दांव न लगाए। हालांकि अभी तक औपचारिक रूप से इसका ऐलान नहीं हुआ है, लेकिन केजरीवाल को अंदेशा है कि एकजुट विपक्ष राहुल गांधी को पीएम फेस बना सकता है। संभव है कि बैठक में जो नजारा केजरीवाल ने देखा होगा, उससे ही उन्होंने इसका अनुमान लगाया हो। नीतीश कुमार और लालू यादव जिस तरह राहुल के इर्द गिर्द मंडराते रहे थे, उससे किसी के लिए यह अनुमान लगाना कठिन नहीं कि राहुल गांधी को ही पीएम फेस घोषित करने की तैयारी है। इसलिए कि नीतीश ने भी स्वीकार कर लिया है कि उनके चेहरे पर वोट नहीं मिलेंगे।

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