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‘आपातकाल में मौलिक अधिकार छीने गए थे अब तो संविधान को ही निलंबित किया जा रहा है’

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नई दिल्ली

प्रख्यात न्यायविद और सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने वर्तमान समय को 1975 के आपातकाल से भी खराब माना है। हाल में आयोजित छठे नीलाभ मिश्र स्मृति व्याख्यान में उन्होंने कहा है कि आपातकाल के दौरान गिरफ्तार किए गए लोगों के खिलाफ राजद्रोह का कानून नहीं लगाया गया था। उन्हें preventive detention law के तहत जेल में डाला गया था। लेकिन आज तो हर छोटे-मोटे मौके पर राजद्रोह कानून का इस्तेमाल किया जा रहा है।

इंदिरा जयसिंह 1975 के आपातकाल पर बात करते हुए स्पष्ट करती हैं कि इमरजेंसी लागू करने के लिए संविधान का खंडन नहीं किया गया था। उसके प्रावधानों का इस्तेमाल कर ही आपातकाल लगाया गया था।वह कहती हैं,”हमारी पीढ़ी ने राजनीतिक और नागरिक अधिकारों को हल्के में लिया क्योंकि उनका मानना था कि उन्हें कभी नहीं छीना जाएगा। लेकिन आपातकाल के दौरान सब छीन लिया गया। संविधान के अनुच्छेद 352 को लागू करके आपातकाल की घोषणा की गई थी, जो राष्ट्रीय आपातकाल लगाने का एक निर्धारित तरीका है। यानी आपातकाल लगाते हु्ए भी संविधान को नकारा नहीं गया। उसकी वैधता से इनकार नहीं किया गया। आपातकाल की घोषणा एक निर्वाचित कार्यकारिणी द्वारा की गई थी।”

उन्होंने इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाया किया कि आपातकाल लगाए जाने का व्यापक विरोध हुआ, जिसके कारण इसे वापस लेना पड़ा और नए चुनावों की घोषणा की गई। जब नई पार्टी सत्ता में आई, तो संविधान के माध्यम से ही आपातकाल घोषित करने की शक्ति को हटाने के लिए संविधान में संशोधन किया गया। आपातकाल की पूरी अवधि और उसके तुरंत बाद संविधान चर्चा के केंद्र में रहा। दोनों पक्षों – जिन्होंने आपातकाल लगाने का विरोध किया और समर्थन किया, सभी ने उदार लोकतंत्र की अपील की।

‘अब तो संविधान को ही निलंबित किया जा रहा है’
देश की वर्तमान परिस्थिति पर बात करते हुए जयसिंह कहती हैं कि आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया था। लेकिन अब संविधान को ही निलंबित किया जा रहा है जिसे केवल अघोषित आपातकाल के रूप में वर्णित किया जा सकता है।पाकिस्तान की स्थिति से तुलना करते हुए उन्होंने कहा, “आप जानते हैं पाकिस्तान ने अपने संविधान को खत्म कर दिया, लेकिन भारत जो झेल रहा है वह बिना लिखित दस्तावेज के संविधान को निलंबित करने का परिणाम है।”

वह आगे कहती हैं कि कार्यपालिका को कानूनी रूप से जवाबदेह नहीं ठहराया जाता है। उन्होंने अफसोस जताया कि यह हर विचारशील नागरिक को उसी तरह परेशान करना चाहिए जैसे यह मुझे परेशान करता है, आप संविधान में वास्तव में संशोधन किए बिना इतने बड़े बदलाव कैसे ला सकते हैं। आज मैं कहूंगी कि संविधान का भ्रम उसकी अनुपस्थिति से भी अधिक खतरनाक है।

कौन हैं इंदिरा जयसिंह?
इंदिरा जयसिंह के नाम कई रिकॉर्ड दर्ज है। वह बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा नामित होने वाली पहली महिला वरिष्ठ वकील, महिलाओं के खिलाफ भेदभाव उन्मूलन पर संयुक्त राष्ट्र समिति में चुनी जाने वाली पहली भारतीय महिला और भारत की अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल नियुक्त होने वाली पहली महिला हैं। जयसिंह को सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले सबसे वरिष्ठ वकीलों में से एक के रूप में जाना जाता है। वह मानवाधिकारों और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अपने जुनून के लिए पहचानी जाती हैं। जयसिंह ने अपने करियर की शुरुआत श्रम न्यायालय में प्रैक्टिस करने से की थी।

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