– प्रबंधन बना मूकदर्शक, नहीं होती कार्रवाई
भोपाल
भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) जैसी महारत्न कंपनी आर्थिक संकट से दौर से गुजर रही है। भेल कार्पोरेट के मुखिया बार-बार खर्चों में कटौती की बात कर रहे हैं तो दूसरी और भेल टाउनशिप की कई संस्थानों को मुफ्त में आफिस सुविधा देने के बाद भी सिर्फ बिजली और पानी का बकाया लाखों भेल प्रशासन नहीें वसूल पा रहा है। ऐसा भी नहीं कि यह बिल एक माह का हो बल्कि सालों से बिल तो आ रहा है लेकिन भेल प्रशासन नेताओं के दबाव के चलते न तो बिजली का कनेक् शन काट पा रहे हैं और न ही पानी का, फिर दूरभाष सुविधा के मामले कहना ही बेकार है। रही बात टाउनशिप में रहने वाले भेल कर्मचारी या अन्य किरायेदारों को तो यदि उसके बिल जमा करने में देर हो गई तो सभी कनेक् शन काट दिये जाते हैं।
जानकारी के मुताबिक बरखेड़ा, पिपलानी, हबीबगंज और गोविन्दपुरा में भेल की यूनियनों सहित कई सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और धार्मिक संस्थानों को भेल प्रशासन ने कार्यालय के आवास आवंटित किये हैं। इन संस्थानों मेें बिजली मुफ्त की समझकर दिन-रात जलाया जा रहा है। वहीं कुछ संस्थान साल में चार बार ही खुलते देखे गये हैं। राष्ट्रीय त्यौहारों पर झंडा वंदन और मिठाई वितरण के बाद यह संस्थान बंद हो जाते हैं। कहने को तो एक यूनियन को एक ही कार्यालय दिया जाता है लेकिन भेल प्रशासन की खास मेहरबानी के चलते कुछ प्रतिनिधि यूनियन को दो-दो कार्यालय आवंटित किये हैं। जिनमें से दोनों के एक -एक कार्यालय बंद दिखाई देते है विशेष आयोजन के लिए ही इन्हें खोला जाता है।
इसी तरह कई अन्य संस्थान कर्मचारी संगठन बनाकर मान्यता प्राप्त संगठन तो कहलाते हैं लेकिन इनके दफ्तर ज्यादातर बंद ही नजर आयेंगे। साल में एक दो बैठक कर ली तो समझों बड़ी बात है। आज जब भेल आर्थिक संकट से दौर से गुजर रहा है उसे कर्मचारियों को वेतन और ठेकेदारों को भुगतान के लाले पड़े हैं ऐसे में कुछ संस्थान अपनी जवाबदारी को समझ ही नहीं पा रहे हैं। इससे भेल के जागरूक कर्मचारी नाराज जरूर हैं लेकिन किसी न किसी संगठन से जुड़े होने के कारण आवाज नहीं उठा पा रहे हैं।
