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देपसांग-डेमचोक पर क्यों अड़ गया चीन, भारत के लिए इस लोकेशन की अहमियत समझिए

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नई दिल्ली

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद हल करने को लेकर बातचीत बेनतीजा रही है। लगभग चार महीने के अंतराल के बाद चीन के साथ शीर्ष स्तर की दो दिन चली सैन्य वार्ता में दोनों पक्षों में विवाद हल करने को लेकर सहमति नहीं बनी। 17 घंटे की बातचीत के बावजूद पूर्वी लद्दाख के देपसांग मैदानों और डेमचोक में सैनिकों के टकराव का हल नहीं निकला। हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया ने सूत्रों के हवाले से खबर दी है कि चीन रणनीतिक रूप से स्थित देपसांग मैदानों, उत्तर में महत्वपूर्ण दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) और काराकोरम दर्रे और डेमचोक के पास चार्डिंग निंगलुंग नाला (सीएनएन) ट्रैक जंक्शन की ओर भारतीय सैनिकों के गश्त करने अधिकार को मानने से इनकार कर दिया है।

हालांकि रविवार-सोमवार को चुशुल-मोल्डो सीमा बैठक स्थल पर कोर कमांडर स्तर की वार्ता के 19वें दौर में तत्काल कोई प्रगति नहीं हुई। सूत्रों ने कहा कि बातचीत पिछले कुछ दौर की तुलना में बेहतर थी। बातचीच में विश्वास बढ़ाने के उपायों को मजबूत करने और 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर फोर्स के स्तर को और नहीं बढ़ाने के लिए कुछ समझौते किए गए थे। 23 अप्रैल को 18वें दौर के बाद अलग-अलग बयानों के विपरीत, मंगलवार को दोनों पक्षों द्वारा एक संयुक्त बयान जारी करने में भी ये दिखा। संयुक्त बयान में कहा गया है कि भारत और चीन शेष मुद्दों को तेजी से हल करने और सैन्य और राजनयिक चैनलों के माध्यम से बातचीत और बातचीत जारी रखने पर सहमत हुए हैं।

देपसांग में विवाद की जड़ क्या है?
देपसांग एक प्लेन इलाका है। हालांकि, इसकी ऊंचाई करीब 16000 से 17 हजार फीट है। ऐसे में सामरिक रूप से यह काफी महत्पवूर्ण है। भारत तीन साल से अधिक समय से पूर्वी लद्दाख में सीमा विवाद हल करने के पहले कदम के रूप में देपसांग और डेमचोक में सैनिकों की वापसी के लिए दबाव डाल रहा है। फैक्ट यह है कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने भारतीय सैनिकों को देपसांग के मैदानों में ‘बॉटलनेक’ या ‘वाई-जंक्शन’ क्षेत्र में उनके पारंपरिक गश्ती केंद्रों (पीपी) 10,11,11ए, 12 और 13 पर जाने से रोक दिया है। यह भारत के अपने क्षेत्र में लगभग 18 किलोमीटर अंदर है। चीन, वास्तव में, इस क्षेत्र में 972 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का दावा करता है। यह तिब्बत को शिनजियांग से जोड़ने वाले अपने महत्वपूर्ण पश्चिमी राजमार्ग जी-219 के काफी करीब है।

​डेमचोक में विवाद से DBO का कनेक्शन
यही स्थिति डेमचोक के पास सीएनएन ट्रैक जंक्शन के पास भी है। इसके अलावा, पैंगोंग त्सो-कैलाश रेंज, गलवान घाटी और गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स जैसे क्षेत्रों में सेना के हटने के बाद बड़े पैमाने पर भारतीय क्षेत्र में बने नो-पैट्रोल बफर ज़ोन बन गया है। इसका मतलब है कि भारतीय सैनिक अब अपने 65 पीपी में से 26 तक नहीं पहुंच सकते हैं। यह त्तर में काराकोरम दर्रे से शुरू होकर पूर्वी लद्दाख में दक्षिण में चुमार तक जाते हैं। यहां से एक रास्ता दौलत बेग ओल्डी (DBO) की तरफ जाता है। दौलत बेग ओल्डी एक ऐसी जगह है जहां मौसम बहुत मुश्किलों भरा होता है। यहां सर्दियों से लेकर गर्मियों में खुले में रहना बहुत मुश्किल होता है। यहां कुछ मिनट से अधिक खुले में खड़े होना संभव नहीं होता है। इसकी वजह तेज हवा और ठंड होती है। दौलत बेग ओल्डी में ही भारत का सबसे मुश्किल एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड (एएलजी) है। इंडियन एयरफोर्स दौलत बेग ओल्डी को (16,300 फीट) को दुनिया की सबसे ऊंची हवाई पट्टी बताता है। पिछले एक दशक के दौरान एयरफोर्स यहां पर हाई-विज़िबिलिटी लैंडिंग करता रहा है। इससे उसकी ताकत का पता चलता है। पिछले तीन वर्षों में एलएसी पर अपनी सैन्य स्थिति को लगातार मजबूत कर रहा है। चीन ने यहां नए बुनियादी ढांचे के निर्माण के अलावा सिक्किम-अरुणाचल प्रदेश सीमा पर भी कदम बढ़ाया है। इसके कारण 9 दिसंबर को तवांग सेक्टर के यांग्त्से में प्रतिद्वंद्वी सैनिकों के बीच झड़प हुई थी।

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