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आमदनी से ज्यादा हो जाता है कर्ज…, महाराष्ट्र की गन्ना बेल्ट का ये कड़वा सच जान डर जाएंगे

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मुंबई

महाराष्ट्र के सांगली, कोल्हापुर, पुणे, सतारा, सोलापुर और अहमदनगर जिलों को एक गन्ना बेल्ट के तौर पर जाना जाता है। गन्ने की मिठास उपजाने वाले इस इलाके से बंधुआ मजदूरी का कड़वा सच भी जुड़ा हुआ है। इस क्षेत्र में गन्ने की खेती से जुड़े काम को करवाने के लिए लालची ठेकेदार भोले-भाले आदिवासी को उचित वेतन और घर देने का वादा करते लाते हैं इसके बाद फिर लंबे समय तक बंधुआ मजदूरी करवाते हैं। हाल ही में भिवंडी में 12 वयस्कों और 13 बच्चों को एक मालिक के चंगुल से छुड़ाया गया। पालघर जिले के विभिन्न हिस्सों से कतकारी जनजाति के ये पुरुष और महिलाएं एक ईंट भट्टा मालिक के कर्ज चक्र में फंस गए थे। ठेकेदार ने अग्रिम राशि को चुकाने के लिए उन्हें अथक परिश्रम करने के लिए मजबूर किया।

पके चावलों पर जिंदा थे मजदूर
इस मामले में गोपनीय सूचना के बाद एक गैर सरकारी संस्था श्रमजीवी संघटना के प्रयासों के बाद छापेमारी की गई और फिर आदिवासियों को बचाया। इसमें सामने आया है कि आदिवासी मजदूर सिर्फ 8 फीट लंबे और 8 फीट चौड़े के एक छोटे से कमरे में रह रहे थे। इतना ही नहीं वे सिर्फ सिर्फ पके चावल के भोजन पर जीवित थे। पुलिस ने खुलासा किया कि पिछले आठ साल से पीड़ितों को उनकी मजदूरी का भुगतान करने से इनकार कर दिया था। उनसे सुबह से शाम तक काम करवाया जाता था और जब वे वेतन मांगते थे, या वापस लौटना चाहते थे तो उन्हें भूखा रखा जाता था। इतना ही नहीं जब ईंट भट्टे पर कोई काम नहीं था, तो उन्हें खेतों में मेहनत करने के लिए मजबूर होना पड़ा। जब कुछ मांगने और विरोध करने पर अतिरिक्त प्रतिबंधों के साथ शारीरिक हिंसा झेलनी पड़ी।

शेल्टरहोम में डाला डेरा
सामाजिक संगठन की पहल पर मुक्त हुए मजदूर अब उसी गांव में एक आश्रय स्थल पर डेरा डाले हुए हैं। बंधुआ मजदूरी का शिकार हुए 18 साल के सुनील भोईर बताते हैं कि ईंट भट्‌टे पर काम के दौरान एक महिला हम पर कड़ी नजर रखती थी, यहां तक कि शौचालय जाने के हमारे दौरे पर भी नजर रखती थी। अगर कोई कुछ करने से इनकार करता था तो आगे कहा कि कुछ करने से इनकार करने का मतलब उन्हीं ईंटों से मारना है, जिन्हें बनाने का काम उन्हें सौंपा गया था। कुछ ऐसी ही दास्तां सुनील वाघे ने सुनाई। वाघे कहते हैं कि डोंबिवली के खोनी गांव के दो भाइयों संजय और विजय पाटिल के लिए हम लंबे समय से बंधुआ मजदूरी कर रहे हैं। पाटिल बंधु ग्राम पंचायत के लिए सड़क, शौचालय, श्मशान और गटर के निर्माण जैसी परियोजनाओं का ठेका लेते थे। इसके लिए हमें ईंट और गारा बनाने के काम करने होते थे। इस मजदूरी के बदले में पाटिल बंधु चाहते थे कि हम बिना किसी वेतन और थोड़े से भोजन राशन के के लिए काम करें।

कैसे निकला रिहाई का रास्ता?
सालों से बंधुआ मजदूरी कर रहे इन आदिवासियों के हालात तब बदल गए जब एक महिला बकरियों को चराने नहीं ले जाने पर अपने पति की पिटाई के बाद एक सामाजिक कार्यकर्ता के पास पहुंची। इसके बाद पाटिल बंधुओं को दिसंबर में गिरफ्तार किया गया था। मजदूरों को बंधुआ श्रम प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 के तहत रिहाई प्रमाण पत्र दिया गया था, जो मजदूरों को 25,000 रुपये की तत्काल राहत सहित 1 लाख रुपये के मुआवजे का हकदार बनाता है, हालांकि यह मुआवज़ा हासिल कर पाना काफी चुनौतीपूर्ण है।

बढ़ रहा है बंधुआ मजदूरी का ट्रेंड
बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 के बावजूद मध्य प्रदेश में जागृत दलित आदिवासी संगठन की एक प्रमुख कार्यकर्ता माधुरी कृष्णास्वामी का कहना है कि गन्ना बेल्ट में बंधुआ मजदूरी पनप रही है। उन्होंने 2022 में एमपी के बड़वानी जिले के 300 आदिवासी प्रवासी मजदूरों को बचाने का नेतृत्व किया जिन्हें महाराष्ट्र और कर्नाटक में गन्ना मिलों में बंधुआ मजदूरी में धकेल दिया गया था। कृष्णास्वामी कहती हैं कि महाराष्ट्र की गन्ना बेल्ट प्रवासी श्रमिकों का केंद्र है। यहां छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और अन्य क्षेत्रों से विस्थापित मजदूर आते हैं। इन्हें ठेकेदार कई प्रकार के झूठे वादे करके ट्रक में भरकर लाते हैं। गन्ना बेल्ट में जिन प्रवासियों को हमने बचाया है। उन्हें उनका स्थान, भाषा का पता नहीं था। उनके मोबाइल फोन छीन लिए गए थे। पंडित का कहना है कि आदिम जनजातियों में खासतौर पर कातकरी समुदाय में बंधुआ मजदूरी प्रथाओं का शिकार होना काफी चिंताजनक है।

काम की तलाश में भटकते हैं
माधुरी कृष्णास्वामी बताती हैं कि जो लोग बंधुआ मजदूरी से छुड़ाए गए उनमें अधिकांश भूमिहीन, अशिक्षित हैं, उनके पास राशन या पहचान पत्र नहीं हैं, दिहाड़ी मजदूर हैं और काम की तलाश में पलायन करते हैं। मुंबई जैसे शहरों में, जहां निर्माण निरंतर होता है, ईंटों की भारी मांग है। ईंट भट्टे शारीरिक मजदूरों पर बहुत अधिक निर्भर हैं, जैसा कि महाराष्ट्र का गन्ना काटने का उद्योग तेजी से बढ़ रहा है। अत्यधिक गरीबी और अशिक्षा के कारण वे सबसे सस्ते श्रमिक उपलब्ध हैं। ईंट भट्ठों, गन्ना कारखानों या खेतों के मालिक जिन्हें ‘सेठ’ कहा जाता है।

आमदनी से ज्यादा होता है कर्ज
सेठ आदिवासियों को छह महीने के श्रम के बदले में 20 हजार से 40 हजार रुपये तक का अग्रिम भुगतान देते हैं। जो अक्सर इसे उत्सुकता से स्वीकार करते हैं। जब निपटान का समय आता है, तो सेठ भ्रामक गणना प्रस्तुत करते हैं और भोजन के लिए वादा किए गए साप्ताहिक भत्ते को ऋण राशि में जोड़ देते हैं। आदिवासियों पर अक्सर उनकी आय से अधिक बकाया हो जाता है और उन्हें कर्ज चुकाने के लिए दूसरे सीजन में वापस लौटने के लिए मजबूर होना पड़ता है। कभी-कभी, सेठ जबरन वापस लाने के लिए आदमी भेजते हैं। कभी-कभी, सेठ मजदूरों को जबरन वापस लाने के लिए आदमी भेजते हैं। जो लोग मना करते हैं उन्हें पीटा जाता है और अगर वे गायब हो जाते हैं तो परिवार के किसी अन्य सदस्य को उठा लिया जाता है। कभी-कभी जब एक मजदूर दूसरे के लिए काम करना शुरू कर देता है, तो ये सेठ आपस में सौदेबाजी कर लेते हैं, जिससे कर्ज बढ़ जाता है, जो उन्हें पीढ़ियों तक काम पर रखने का एक तरीका बन जाता है।

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