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Thursday, April 30, 2026
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सुप्रीम कोर्ट CAA पर रोक लगाने वाली याचिकाओं पर सुनवाई को सहमत, इन दलों ने उठाए हैं सवाल

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नई दिल्ली

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग CAA के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), 2024 पर रोक लगाने की मांग वाली याचिकाओं पर 19 मार्च को सुनवाई करने पर सहमति जताई है। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने याचिकाकर्ताओं के वकील कपिल सिब्बल के अनुरोध को स्वीकार कर लिया। मामले पर तुरंत सुनवाई की मांग करते हुए सिब्बल ने कहा, “सीएए 2019 में पारित किया गया था। उस समय कोई नियम नहीं था, इसलिए कोई रोक नहीं दी गई थी। अब उन्होंने चुनाव से पहले नियमों को नोटिफाई कर दिया है। यदि नागरिकता दी गई, तो इसे बदलना असंभव होगा। इसलिए अंतरिम आवेदन पर सुनवाई की जा सकती है।”

केंद्र ने कहा- नागरिकता देने पर सवाल उठाने का अधिकार नहीं
केंद्र का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि किसी भी याचिकाकर्ता के पास नागरिकता देने पर सवाल उठाने का कोई अधिकार नहीं है। पीठ ने तब कहा कि वह नियमों पर रोक लगाने की मांग करने वाले सभी आवेदनों को मंगलवार को सुनवाई के लिए लिस्टेड करेगी। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि 237 याचिकाओं वाले पूरे बैच को नए आवेदनों के साथ लिस्टेड किया जाएगा।

केरल के IUML समेत कई दलों ने सुप्रीम कोर्ट में दी है याचिका
केंद्र सरकार ने 11 मार्च को नागरिकता (संशोधन) नियम, 2024 को नोटिफाइड किया था। जो प्रभावी रूप से 2019 के विवादास्पद सीएए को लागू करता है। केंद्र सरकार द्वारा सीएए के लिए नियम जारी करने के एक दिन बाद, केरल के राजनीतिक दल इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने नियमों के कार्यान्वयन पर रोक लगाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने मांग की कि विवादित कानून और विनियमों पर रोक लगाई जाए, और इस कानून के लाभ से वंचित मुस्लिम समुदाय के लोगों के खिलाफ कोई कठोर कदम नहीं उठाया जाए। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के अलावा, डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (DYFI), असम विधानसभा में विपक्ष के नेता, देबब्रत सैका और असम से कांग्रेस सांसद अब्दुल खालिक और अन्य ने भी नियमों पर रोक लगाने के लिए आवेदन दायर किए।

याचिका में कहा गया है कि नियम साफ तौर पर मनमाने पूर्ण हैं और केवल उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर व्यक्तियों के एक वर्ग के पक्ष में अनुचित लाभ पैदा करते हैं, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत अनुमति योग्य नहीं है।

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