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नीतीश कुमार की USP है बरकरार, चुनाव चाहे कोई लड़े ‘राजा’ कौन बनेगा यह सुशासन बाबू ही तय करेंगे

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पटना

बिहार की राजनीति में पिछले दो दशक से एक बात कही जाती है- ‘चुनाव चाहे कोई भी पार्टी लड़े, लेकिन सत्ता के सिंहासन पर कौन बैठेगा यह नीतीश कुमार ही तय करेंगे।’ लोकसभा चुनाव का रिजल्ट आने के बाद यह लाइन अब केवल बिहार में ही नहीं, केंद्र में भी चरितार्थ हो गई है। सवाल ही सवाल बन चुके नीतीश कुमार के लिए 2024 लोकसभा का चुनाव उनके लिए जवाब बन कर आया। 2024 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में जनता दल यू (जेडीयू) 16 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ी और 12 पर जीती यानी 75 प्रतिशत। बिहार की जनता ने नीतीश कुमार को डिस्टिंक्शन देकर यह साबित कर डाला कि नीतीश कुमार का यूएसपी बरकरार है।

एनडीए में लौटने की आलोचना
एनडीए गठबंधन में लौटने की काफी आलोचना भी हुई। राजनीतिक गलियारों में यह कहा जाने लगा कि अब नीतीश कुमार कोई बड़ा फैक्टर नहीं रह गए। बिहार में हुए उप चुनाव के दौरान नीतीश कुमार पर यह भी आरोप लगा कि इनमें 100 फीसदी कुर्मी, कोयरी का वोट ट्रांसफर कराने का माद्दा भी नहीं रहा। महागठबंधन में रहकर जब नीतीश कुमार सरकार चला रहे थे तब पीएम नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह कहते फिरते थे कि नीतीश कुमार के लिए दरवाजे खिड़की बंद है। तब भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी और नेता प्रतिपक्ष विजय सिन्हा अकेले चुनाव लड़ने के पक्षधर थे।

बिहार का दौरा जारी रहा, लेकिन नीतीश कुमार को फिर से एनडीए में आने पर बिहार के नेता खुश नहीं दिखे। अब तक भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी और नेता प्रतिपक्ष विजय सिन्हा अकेले दम पर चुनाव लड़ने की मंशा ठान भी ली थी। दबी जुबान से ही सही पर, नीतीश कुमार के एनडीए में शामिल होने की काफी आलोचना हुई। कहा जाने लगा कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को प्रदेश भाजपा नेतृत्व पर भरोसा नहीं। अब इस भाजपा के सांगठनिक क्षमता की खूबसूरती कह लें कि नीतीश कुमार के फिर से एनडीए के सीएम बनने पर विरोध का स्वर नहीं फूटा। एक साथ सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा को बुलाया गया और डेप्युटी सीएम के रूप में प्रोजेक्ट किया गया। एक बदलाव यह जरूर आया कि डेप्युटी सीएम को लेकर नीतीश कुमार से कोई राय नहीं ली गई और नीतीश कुमार के विरुद्ध आग उगलते रहने वाले सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा के रूप में प्रोजेक्ट किया और तब नीतीश कुमार ने भी कोई हस्तक्षेप भी नहीं किया।

इस रिजल्ट का अहसास भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को था!
जिस तरह से भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व प्रदेश नेतृत्व की राय लिए बगैर जनता दल यू (जेडीयू) को एनडीए में लाया उससे एक बात तो साफ दिखती है कि वर्ष 2024 लोकसभा के बारे में इस तरह के परिणाम का आभास तो था। अगर जेडीयू एनडीए का हिस्सा नहीं रहता तो मोदी के तीसरी बार केंद्र की सत्ता थामने पर ग्रहण तो लग ही जाता।

लोजपा को पांच सीटें मिलने का स्वागत तो नहीं किया गया
केंद्रीय नेतृत्व ने जिस तरह से लोजपा(आर) को हिस्सेदारी में पांच सीटें दी गई और रालोमो और हम को एक-एक सीटें देने की भी काफी आलोचना हुई। एनडीए गठबंधन में शामिल दलों को ही नहीं, बल्कि राजनीतिक गलियारों में, अखबारी दुनिया में पीएम मोदी के इस निर्णय पर टिप्पणी आई कि मोदी अपने हनुमान पर कुछ ज्यादा भरोसा कर लिया है।

परिणाम भाजपा केंद्रीय नेतृत्व की सोच के अनुकूल
अनुमान करें तो जिस तरह से नीतश कुमार को एनडीए में शामिल किया गया, चिराग को पांच सीटें दी गई और मोदी के दौरे पर दौरे हुए वह यह संकेत देते हैं कि भाजपा केंद्रीय नेतृत्व को इस परिणाम का आभास था। कल्पना करें कि नीतीश कुमार एनडीए गठबंधन में नहीं होते और चिराग को भी एक दो सीट में सिमटा दिया जाता। तो इंडिया गठबंधन की स्थिति इससे भी बेहतर होती। यह अतिश्योक्ति भीं नहीं कि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में चिराग के 100 फीसदी स्ट्राइक रेट और नीतीश कुमार के 75 फीसदी स्ट्राइक रेट नहीं होते तो मोदी की हैट्रिक के भी आसार कम हो जाते।

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