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टूट गया ‘माया’जाल, यूपी में जीरो पर आई BSP का बंटाधार, ना अपनी सीटें बचा सकी ना साख

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लखनऊ:

I.N.D.I.A. और NDA से दूरी बनाकर अकेले चुनाव मैदान में उतरना बसपा को बहुत भारी पड़ा। गलत निर्णय के कारण बसपा अपने अब तक के सबसे खराब दौर में पहुंच गई। एक भी सीट जीतना तो दूर, वह किसी भी सीट पर दूसरे नंबर पर नहीं रही। पार्टी का प्रदर्शन 1989 से भी खराब रहा, जब वह पहला चुनाव लड़ी थी। तब बसपा ने 9.90% वोट हासिल किए थे और दो सीटें भी जीती थीं। इस चुनाव में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली और वोट प्रतिशत गिरकर 9.14% रह गया। इस तरह बसपा न तो कोई सीट जीत सकी और न साख बचा सकी।

बसपा नहीं भांप सकी जमीनी हालात
बसपा की इस हालत की कई वजहें हैं। इनमें एक प्रमुख वजह यह है कि वह हालात और परिस्थितियों को नहीं भांप पाई। इस चुनाव में राजनीति NDA और I.N.D.I.A. दो धड़ों में बंट गई लेकिन बसपा इसको नहीं भांप सकी और अकेले लड़ने का निर्णय लिया। जबकि यह स्थिति पहले से साफ थी। क्योंकि इससे पहले 2014 का उदाहरण बसपा के सामने था। तब अकेले चुनाव लड़ने के बाद एक भी सीट नहीं ला सकी थी। जब 2019 में सपा से गठबंधन करके चुनाव लड़ा था तो 10 सीटें मिली थीं।

आकाश को हटाने से नाराज़ हुए वोटर
बसपा प्रमुख मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को इस लोकसभा चुनाव में जोर-शोर से उतारा। वह युवाओं के मुद्दे उठा रहे थे। उनसे युवा जुड़ भी रहे थे, लेकिन बीच चुनाव में ही उनको पद से हटा दिया। इससे युवाओं में यह संदेश गया कि पार्टी भाजपा के दबाव में काम कर रही है। इससे उसका अपना कोर वोटर भी छिटक गया। आकाश पर 27 अप्रैल को हरदोई में FIR हुई। उसके बाद उनकी रैलियां बंद कर दी गईं। बाद में उनको 8 मई को मायावती ने अपने उत्तराधिकारी और को-ऑर्डिनेटर पद से हटा दिया गया। उसका असर नतीजों में साफ दिख रहा है।

पहले तीन चरणों के लिए आकाश ने सभाएं कीं। उनमें 26 सीटों के लिए चुनाव हुआ। इनमें से 19 सीटें (73%) ऐसी हैं, जिन पर बसपा प्रत्याशियों को 50 हजार से अधिक और 6 (23%) पर एक लाख से अधिक वोट मिले हैं। बाद के चार चरणों में 64 सीटों पर चुनाव हुआ। इनमें से 25 (39%) सीटों पर 50 हजार से अधिक और 11 सीटों (17%) पर ही एक लाख से अधिक वोट मिले। जाहिर है आकाश को हटाए जाने के बाद से बसपा के वोटरों में नाराजगी बढ़ी और वे दूसरी तरफ शिफ्ट हो गए।

पार्टी नेताओं पर भरोसा नहीं
आकाश के अलावा पार्टी से सतीश चंद्र मिश्र जैसे बड़े नेताओं को पहले ही किनारे कर दिया गया। इमरान मसूद को पार्टी में लिया, लेकिन टिकट न मिलने के कारण वह कांग्रेस में चले गए। अपने 10 सांसदों में सिर्फ दो पर ही दोबारा भरोसा जताया। जिनको टिकट नहीं मिला, वे दूसरे दलों में चले गए।

प्रचार में नहीं दिखा दम
मायावती ने यूपी में 28 सभाएं कीं। आकाश ने 17 सभाएं कीं। ये सभाएं भी आचार संहिता लागू होने के बाद हुईं। उससे पहले पार्टी का कोई प्रचार नहीं हुआ। सतीश मिश्र स्टार प्रचारक की लिस्ट में शामिल थे, लेकिन उनसे प्रचार नहीं करवाया। पार्टी के प्रवक्ताओं को पहले ही हटा दिया गया। सोशल मीडिया पर भी सक्रियता नजर नहीं आई।

प्रत्याशी चयन में कन्फ्यूजन
टिकट वितरण में भी पार्टी में कन्फ्यूजन दिखा। आम तौर पर बसपा चुनाव से पहले पार्टी प्रत्याशियों का ऐलान कर देती है। लेकिन इस बार अंतिम समय में प्रत्याशी तय किए। कई जगह सवर्ण प्रत्याशी उतारकर भाजपा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की तो कई जगह बाद में बदलकर मुस्लिम और ओबीसी प्रत्याशी उतारे। कई बार प्रत्याशियों में बदलाव किया।

पिछले 4 चुनावों में प्रदर्शन
लोकसभा चुनाव 2014 में बहुजन समाज पार्टी खाता नहीं खोल पाई थी। मोदी लहर में यूपी की 80 में से 73 सीटों पर एनडीए को जीत मिली थी। वहीं, सपा 5 और कांग्रेस 2 सीटों पर जीती थी। तब उसका वोट शेयर 19.77 फीसदी था। 2017 के विधानसभा चुनावों में जब उसने 19 सीटें जीतीं, तो उसे 22.23 फीसदी वोट मिले।

यूपी विधानसभा चुनाव 2022 में बसपा ने प्रदेश की 403 सीटों में से केवल 1 सीट पर जीत दर्ज की। हालांकि, उसका वोट शेयर 12.9 फीसदी था, जो यूपी में जाटव वोट बैंक के आसपास था। यूपी में दलितों की आबादी 21 फीसदी के करीब है। इसमें जाटव वोटरों का शेयर करीब 13 फीसदी है।

लोकसभा चुनाव 2019 में बसपा ने सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने आगे बढ़कर मायावती के साथ चुनावी गठबंधन किया था। तब बसपा को 10 सीटों पर जीत मिली। यूपी चुनाव 2022 में बसपा का सबसे कम वोट शेयरों में से एक था। विधानसभा में केवल एक ही सीट मिली।

बसपा का लोकसभा चुनावों में प्रदर्शन-
चुनाव- सीटें- वोट
1989 2 9.90%
1991 1 8.70%
1996 6 20%
1998 4 20.90%
1999 14 22.80%
2004 10 22.17%
2009 20 27.42%
2014 0 19.77%
2019 10 19.43%
2024 0 9.15%

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