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IAS-IPS या मंत्री बने दलितों के बेटे-बेटियों को क्या नहीं मिलेगा आरक्षण, सुप्रीम कोर्ट जज ने क्यों कहा-एक पीढ़ी तक मिले कोटा

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नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की पीठ ने दलितों के आरक्षण को लेकर एक बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने 6:1 के बहुमत से अनुसूचित जाति के कोटे में सब कैटेगरी बनाने की राज्यों को मंजूरी दे दी है। ये सब कैटेगरी दलितों के आरक्षण के भीतर उन लोगों की होगी, जो आरक्षण के लाभ से अब तक वंचित रहे हैं। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि कोटे में यह कोटा यानी जो उप श्रेणी बनाई गई है, उसे पूरा का पूरा 100 फीसदी आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने यह फैसला देते हुए स्पष्ट रूप से कहा कि सब क्लासीफिकेशन किसी भी हाल में संविधान के समानता के अधिकार यानी अनुच्छेद 14 और 341 का उल्लंघन नहीं है। इस पीठ में चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ के अलावा जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बेला त्रिवेदी, जस्टिस पंकज मित्तल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा शामिल हैं।

जस्टिस गवई ने क्यों कहा-दलितों और आदिवासियों में कुछ ही लोगों को कोटे का फायदा
जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि यह राज्य का कर्तव्य है कि वह ज्यादा पिछड़े लोगों को तवज्जो दे। अनुसूचित जाति और जनजाति में कुछ ही लोग हैं, जो अपने आरक्षण कोटे का फायदा उठा पाते हैं। जमीनी हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता है। एससी-एसटी के भीतर भी ऐसी कैटेगरी हैं, जिन्हें सदियों से दबाया गया।

दलित समुदाय में जो पढ़ेगा-लिखेगा, वही उठा पाएगा आरक्षण का फायदा
सुप्रीम कोर्ट में जज शिवाजी शुक्ला के अनुसार, दरअसल जस्टिस गवई का कहना था कि आरक्षण का लाभ एक खास वर्ग तक को ही मिल पा रहा है। चाहे वो दलित हों या अन्य पिछड़ा वर्ग। दलितों में भी बहुत सी ऐसी कैटेगरी है, जिन तक आरक्षण का लाभ पहुंच ही नहीं पाता। जैसे सरकारी नौकरी में आरक्षण किसी दलित समुदाय के व्यक्ति को तभी मिल सकता है, जब वो पढ़ाई करके प्रतियोगी परीक्षाओं को देने की स्थिति में पहुंचे। जब वह वहां तक पहुंचेगा ही नहीं तो वह आरक्षण का फायदा कैसे उठा सकेगा। यानी अगर किसी राज्य में 15 फीसदी आरक्षण अनुसूचित जातियों के लिए है तो उस 15% के तहत वो कुछ अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण तय कर सकते हैं।

एससी-एसटी में क्रीमीलेयर का सिद्धांत लागू करने पर बात
एडवोकेट शिवाजी शुक्ला के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के 7 जजों में से 4 जस्टिस गवई की इस टिप्पणी पर सहमति जताई कि एससी-एसटी कोटे में भी क्रीमीलेयर का सिद्धांत लागू होना चाहिए। राज्यों को एससी-एसटी कैटेगरी में भी क्रीमी लेयर की पहचान के लिए एक नीति लानी चाहिए। और ऐसे लोगों को कोटे से बाहर करना चाहिए। असली समानता हासिल करने का यही इकलौता रास्ता है। वहीं, जस्टिस विक्रम नाथ ने भी कहा कि ओबीसी में लागू क्रीमीलेयर को लेकर एससी में लागू करना चाहिए। जस्टिस पंकज मित्तल ने कहा अगर पहली पीढ़ी आरक्षण के जरिए हायर स्टेटस पर पहुंच चुकी है तो दूसरी पीढ़ी को यह आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने भी जस्टिस गवई के मत का समर्थन किया।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी फैसले पर लागू नहीं
एडवोकेट शिवाजी शुक्ला के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के सामने यह मामला था कि क्या राज्य सरकार एससी-एसटी कोटे में सब कैटेगरी बना सकती है? कोर्ट ने राज्यों को सब कैटेगरी बनाने की सहमति दी है। अब राज्य बनाएं या न बनाएं, ये उन पर निर्भर करता है। सुप्रीम कोर्ट जजों ने यह फैसला देते हुए जो टिप्पणी दी है, वो बस राय भर है। वो बाध्यकारी नहीं है। यह राज्यों की इच्छा पर निर्भर करेगा। साथ ही सब कैटेगरी बनाने से पहले उन्हें इस बारे में पर्याप्त आंकड़े भी देने होंगे कि जिस समुदाय को वो सब कैटेगरी के तहत कोटा देने जा रहे हैं, उनकी आबादी कितनी है और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति क्या है और क्या उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा था।

जस्टिस त्रिवेदी ने इस फैसले से अलग क्या फैसला लिखा
जस्टिस बेला त्रिवेदी ने कहा कि अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जाति की प्रेसीडेंशियल लिस्ट में राज्य छेड़छाड़ नहीं कर सकते हैं। किसी जाति को प्रेसीडेंशियल लिस्ट से बाहर करना या अंदर केवल संसद ही कर सकती है। एससी-एसटी लिस्ट में उप कैटेगरी बनाने से अनुच्छेद 341 का मकसद ही खत्म हो जाएगा, जिसमें राजनीतिक पार्टियों के इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने की आशंका बनी रहेगी।

जब जज ने कहा-आरक्षण नीति भी गुब्बारे जैसी हो गई
जस्टिस पंकज मित्तल ने कहा कि यह आम समझ है कि किसी वर्ग को खुश करने के लिए एक बार जो दिया जाता है, उसे वापस नहीं लिया जा सकता। संविधान के तहत आरक्षित वर्ग के लोगों को दिए गए लाभ भी वापस नहीं लिए जा सकते। एक बार दी गई हर रियायत किशमिश या गुब्बारे की तरह फूलती चली जाती है। आरक्षण की नीति के साथ भी यही हुआ। उन्होंने कहा कि आरक्षण लागू करने से जातिवाद फिर से पनपता है। आरक्षण दलितों के उत्थान के तरीकों में से एक है, लेकिन इसे लागू करने से जातिवाद फिर से पनपता है।

2004 के चिन्नैया फैसले में क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले से 2004 के ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य जजमेंट को पलट दिया, जिसमें यह कहा गया था कि राज्य प्रेसीडेंशियल लिस्ट में छेड़छाड़ नहीं कर सकते। इसमें यह कहा गया था कि अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जातियों को नोटिफाई किया जा सकता है। इसकी सब कैटेगरी नहीं बनाई जा सकती है। उस वक्त आंध्र प्रदेश सरकार ने भी पंजाब जैसा एक कानून बनाया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अवैध करार दिया था।

50 साल पहले का पंजाब का फैसला, जिसका अंजाम अब
करीब 50 साल पहले 1975 में पंजाब सरकार ने अनुसूचित जाति की नौकरी और कॉलेज के आरक्षण में वाल्मीकि और मज़हबी सिख जातियों के लिए 25 फीसदी कोटा तय किया था, जिसे पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने 2006 में ख़ारिज कर दिया था। खारिज करने का आधार 2004 का एक सुप्रीम कोर्ट का फैसला था, जिसमें कहा गया था कि अनुसूचित जाति की सब-कैटेगरी नहीं बनाई जी सकती। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि राज्यों के पास ऐसा करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि अनुसूचित जाति की सूची अनुच्छेद 341 के तहत राष्ट्रपति की ओर से बनाई जाती है। यानी इसे सिर्फ संसद ही बना सकती है, जिस पर राष्ट्रपति मुहर लगाता है। आखिरकार यह मामला सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की पीठ के पास पहुंचा।

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