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कोटे के अंदर कोटा स्वीकार… SC के फैसले से इन राज्यों में होगा नई राजनीति का उभार

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नई दिल्ली,

देश में अभी अनुसूचित जाति (एससी) को 15% और अनुसूचित जनजाति (एसटी) को 7.5% आरक्षण मिलता है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एससी और एसटी की जातियों के इसी 22.5% के आरक्षण में ही राज्य सरकारें एससी और एसटी के कमजोर वर्गों का अलग से कोटा तय कर सकेंगी. मान लीजिए कि किसी राज्य में एससी की A, B, C और D जातियों को आरक्षण मिलता है. अब सरकार C और D जातियों के लिए इसी 15% कोटे से एक कोटा तय कर सकती हैं. यही एसटी के 7.5% आरक्षण में लागू होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने कोटे के अंदर कोटे की अनुमति राज्य सरकारों को दे दी है. हालांकि, अपने फैसले में उसने ये भी साफ किया है कि राज्य अपनी मर्जी और राजनीतिक महत्वाकांक्षा के आधार पर फैसला नहीं ले सकते. अगर ऐसा होता है तो उनके फैसले की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है.

अगर कोई राज्य किसी जाति को कोटे के अंदर कोटा देती है तो उसे साबित करना होगा कि ऐसा पिछड़ेपन के आधार पर ही किया गया है. ये भी देखा जाएगा कि किसी एससी-एसटी के कुल आरक्षण का उसके किसी एक वर्ग को ही 100% कोटा न दे दिया जाए.

फैसले का सियासी असर
भारत की राजनीति जाति पर बहुत ज्यादा टिकी है. पूरब से पश्चिम तक और उत्तर से दक्षिण तक… जातियों की ही बात होती है. अभी ओबीसी की राजनीति पर चर्चा तेज हो गई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दलित-आदिवासी की सियासत भी तेज होने की संभावना है. माना जा रहा है कि इस फैसले के बाद अब दलित-आदिवासी एक समूह नहीं रह जाएगा. उसके अंदर ही अलग-अलग वर्ग खड़े हो जाएंगे और फिर उससे जुड़ी नई तरह की राजनीति शुरू हो जाएगी.

अलग-अलग राज्यों की राजनीतिक पार्टियां दलित और आदिवासी की राजनीति करती हैं. मसलन, यूपी में मायावती की बसपा दलितों की राजनीति करती हैं. समाजवादी पार्टी को पिछड़ों की राजनीति कर पहचान मिली है. बिहार में भी लालू यादव-नीतीश कुमार की राजनीति जाति की राजनीति पर ही टिकी है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यहां सियासत में बड़े बदलाव दिख सकते हैं और यहां एससी-एसटी के अलग-अलग वर्गों के अलग-अलग राजनीतिक नेतृत्व उभर सकते हैं.

किस राज्य में कितने दलित-आदिवासी?
– उत्तर प्रदेशः राज्य में दलित जाटव और गैर-जाटव में बंटे हुए हैं. कुल आबादी में जाटव 12% और गैर-जाटव 10% हैं. दलितों की कुल आबादी में 56 फीसदी जाटव ही हैं. जाटवों के अलावा दलितों की बाकी उपजातियों में पासी 16 फीसदी, धोबी, कोरी और वाल्मीकि 15 फीसदी और गोंड, धानुक और खटीक करीब 5 फीसदी हैं. वहीं, गैर-जाटव दलितों में वाल्मीकि, खटीक, पासी, धोबी और कोरी समेत तमाम उपजातियां हैं.

– बिहारः यहां पिछले साल ही जातिगत जनगणना हुई थी. इसके आंकड़ों के मुताबिक, राज्य की 13 करोड़ से ज्यादा आबादी में 27% पिछड़ा वर्ग, 36% अति पिछड़ा वर्ग, 19% अनुसूचित जाति और 1.68% अनुसूचित जनजाति है. बिहार की सियासत में पहले सवर्णों का प्रभाव था, लेकिन फिर ओबीसी की सियासत शुरू हो गई. जातिगत जनगणना के बाद बनी नई ईबीसी कैटेगरी यानी अति पिछड़ा वर्ग की राजनीति तेज हो गई थी. मगर अब जब कोटे के अंदर कोटा की बात होगी तो दलित और आदिवासियों की सियासत भी तेज हो सकती है.

– महाराष्ट्रः दलितों की तीन दर्जन से ज्यादा जातियां हैं. इनमें महार और मतांग प्रमुख हैं. महार जाति के लोग ज्यादा पढ़े-लिखे और सामाजिक-राजनीतिक रूप से आगे हैं. 1956 में जब डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया तो ज्यादातर महार जाति के लोग ही बौद्ध बने थे. महार के बाद मतांग दूसरा सबसे बड़ा दलित समुदाय है. वहीं, गोंड और भील दो बड़े आदिवासी समुदाय हैं. गोंड विदर्भ खासकर गढ़चिरौली और चंद्रपुर जिले में तो भील नंदुरबार, नाशिक और धुले जिले में बहुल हैं.

– राजस्थानः राज्य की लिस्ट में 59 जातियां दलित हैं. इनमें सबसे बड़ा समुदाय मेघवाल है, जिनकी ज्यादातर आबादी बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर और जोधपुर में बसी है. पूर्वी राजस्थान में बैरवा और जाटवों का दबदबा है. मीना सबसे प्रभावशाली आदिवासी समुदाय है और दर्जनों विधानसभा सीटों पर अच्छा-खासा असर डालते हैं. वहीं, भील बांसवाड़ा और डुंगरपुर जिले में बसे हैं.

– ओडिशाः राज्य की लगभग 23 फीसदी आबादी आदिवासी और 17 फीसदी दलित है. राज्य में 62 जनजातियां और 13 अन्य आदिम जनजातियां हैं. खोंड सबसे ज्यादा है, जो दक्षिणी ओडिशा के रायगढ़, कंधमाल, कालाहांडी और कोरापुट में बसे हैं. संथाल दूसरा सबसे बड़ा आदिवासी समुदाय है, जबकि गोंड तीसरे नंबर पर है. ओडिशा में 93 जातियां दलित हैं. इनमें पान सबसे बड़ा समुदाय है और इसके बाद डोम जाति है. धोबा, गांडा, कांद्रा और बौरी जातियों का भी अच्छा-खासा प्रभाव है.

– छत्तीसगढ़ः राज्य की 30 फीसदी से ज्यादा आबादी आदिवासी है. 43 आदिवासी समुदायों में गोंड सबसे प्रभावशाली है और जनजातीय आबादी में इनकी 55% हिस्सेदारी है. इनके बाद कांवड़ 11% और ओरांव 10% हैं. यहां 44 जातियां दलित हैं, जिनकी राज्य की आबादी में लगभग 13 फीसदी हिस्सेदारी है. बैरवा-रैदास जैसी जातियों का प्रभाव सबसे ज्यादा है.

– मध्य प्रदेशः राज्य की लगभग 16 फीसदी आबादी दलित है. दलितों में सबसे बड़ा समुदाय चमड़े का काम करने वाला समुदाय है. मालवा क्षेत्र में रहने वाला बलाई दूसरा सबसे बड़ा समुदाय है. वहीं, एसटी की आबादी एमपी में 21 फीसदी है. सबसे बड़ा आदिवासी समुदाय भील है. दूसरे नंबर पर गोंड है.

– पश्चिम बंगालः राजबंशी सबसे बड़ा दलित समुदाय है, जिसकी आबादी 18 फीसदी है. उत्तरी बंगाल की विधानसभा की 20 सीटों पर इनका असर है. मतुआ दूसरा सबसे बड़ा समुदाय है, जिसका उत्तर और दक्षिण 24 परगना, नादिया, हावड़ा, कूचबिहार, उत्तरी और दक्षिणी दिनाजपुर और मालदा जैसे जिलों में दबदबा है. तीसरा बड़ा समुदाय बागड़ी है, जो बांकुरा और बीरभूम में बसे हैं.

– गुजरातः 27 जातियां दलित हैं. इनमें वांकर सबसे प्रभावशाली है, जिनकी राज्य की एससी आबादी में लगभग 35-40 फीसदी हिस्सेदारी है. वांकर के बाद दूसरा बड़ा समुदाय रोहित है, जिसकी हिस्सेदारी लगभग 25 से 30 फीसदी है. वहीं, आदिवासियों में सबसे बड़ा समुदाय भील है, जिसकी एसटी आबादी में हिस्सेदारी लगभग 43 फीसदी है. डांग, पंचमहल, भरूच, बनासकांठा और साबरकांठा में भीलों की अच्छी-खासी आबादी है. हलपटी दूसरा सबसे बड़ा समुदाय है जो सूरत, नवसारी, भरूच और वलसाड़ में है.

– असमः राज्य की कुल आबादी में 12 फीसदी से ज्यादा आदिवासी हैं. कार्बी आंगलोंग और उत्तरी कछार पहाड़ी जिले में 15 समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा है. इनके अलावा 14 और जनजातियां हैं. बोडो सबसे बड़ा आदिवासी समुदाय है, जो राजनीतिक रूप से भी सबसे ज्यादा ताकतवर है. कार्बी तीसरा सबसे बड़ा आदिवासी समुदाय है.

– उत्तराखंडः यहां की आबादी में 55 फीसदी से ज्यादा ठाकुर और ब्राह्मण हैं. ओबीसी 18 फीसदी हैं, जबकि एससी-एसटी की हिस्सेदारी 22 फीसदी है. हरिजन और बाल्मीकि दो सबसे बड़ी दलित जातियां हैं. जबकि, जौनसारी और थारू राज्य का सबसे बड़ा आदिवासी समुदाय है.

– त्रिपुराः राज्य में 19 जनजातियां हैं, जो राज्य की कुल आबादी का 30 फीसदी से ज्यादा है. देबबर्मा सबसे बड़ा आदिवासी समुदाय है. देबबर्मा समुदाय ने त्रिपुरा में शासन भी किया है. राज्य में 34 जातियां दलित हैं, जिनकी आबादी 18 फीसदी है. दलितों में दास, बैद्यकार, शब्दकार, सरकार का दबदबा है.

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