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DU में वापस पकड़ बना रही है NSUI, डूसू चुनाव में प्रेजिडेंट पोस्ट जाने से एबीवीपी को हो गया बड़ा नुकसान

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नई दिल्ली

DUSU में प्रेजिडेंट पोस्ट समेत दो पोस्ट पर जीत से NSUI की दिल्ली यूनिवर्सिटी में पकड़ मजबूत होती नजर आ रही है। ABVP पिछले चार बार से प्रेजिडेंट पोस्ट पर काबिज थी और 2017 से पहले से भी पांच साल से DUSU पर उसकी कमान थी। केंद्र में बीजेपी की सत्ता के बीच प्रेजिडेंट पोस्ट का जाना ABVP के लिए बड़ा नुकसान है।

देश की सबसे बड़ी सेंट्रल यूनिवर्सिटी डीयू की स्टूडेंट्स यूनियन (DUSU) एक बड़ी यूनियन है, जिससे 52 कॉलेज/विभाग जुड़े हैं। देश के बाकी यूनिवर्सिटी की यूनियन और छात्र संगठनों के लिए DUSU चुनाव काफी अहम रहते हैं। NSUI की DUSU में 2017 के बाद की इस वापसी से यूनियन काफी उत्साहित है। प्रेजिडेंट पोस्ट पर रौनक खत्री और जॉइंट सेक्रेटरी पर लोकेश चौधरी की यह जीत काफी हद तक उनकी अपने मेहनत का नतीजा है।

2017 में मिली थी ऐसी जीत
2017 में NSUI के रॉकी तुसीद ने प्रेजिडेंट पोस्ट और कुणाल सहरावत ने वाइस प्रेजिडेंट पोस्ट जीतकर डूसू की टॉप-2 पोस्ट पर कब्जा किया था। उस वक्त भी यह एनएसयूआई के लिए स्पेशल दिन था क्योंकि 2012 के बाद से डूसू में मजबूत जगह बनाने से एनएसयूआई हर साल रह जाता था। 2012 से लेकर 2016 तक एबीवीपी ने डूसू पर कब्जा जमाए रखा। 2016 में एनएसयूआई ने जॉइंट सेक्रेटरी पोस्ट जीतकर कुछ काम तो किया, मगर यह नाकाफी था। बाकी टॉप तीन पोस्ट एबीवीपी ने ही जीती थी।

2023 में डूसू के लिए प्रेजिडेंट तुषार डेढ़ा (एबीवीपी), वाइस प्रेजिडेंट अभि दहिया (एनएसयूआई), सेक्रेटरी अपराजिता (एबीवीपी) और जॉइंट सेक्रेटरी सचिन बैसला (एबीवीपी)चुने गए थे। इससे पहले कोविड से पहले चुनाव 2019 को हुए थे, जिसमें एबीवीपी ने तीन सीटों पर कब्जा किया था और एक सीट (सेक्रेटरी) एनएसयूआई के नाम रही थी। एबीवीपी के अक्षित दहिया प्रेजिडेंट बने थे। 2018 में भी डूसू में एबीपीपी को 3 और एनएसयूआई को 1 पोस्ट मिली।

प्रेजिडेंट पोस्ट एबीवीपी के अंकिव बसोया ने जीती थी, हालांकि फर्जी डिग्री की वजह से वे हटा दिए गए और वाइस प्रेजिडेंट पोस्ट पर जीते एबीवीपी कैंडिडेट शक्ति सिंह इस पोस्ट पर प्रमोट हुए। 2017 में एनएसयूआई को प्रेजिडेंट (रॉकी तुसीद), वाइस प्रेजिडेंट और बाकी दो पोस्ट एबीवीपी को मिलीं। 2016 में प्रेजिडेंट (अमित तंवर) समेत तीन सीटें एबीपीवी और एक एनएसयूआई को मिली थी। 2014 और 2015 में एबीवीपी का क्लीन स्वीप था।

इस बार वोटिंग को लेकर ठंडा रहा मिजाज
डूसू चुनाव को लेकर जो जोश कैंपेनिंग में दिखता है, वो वोटिंग में बिल्कुल नहीं दिखता। इस बार डूसू में ठंडी वोटिंग रही। वोटिंग पर्सेंटेज करीब 35% था, जो 2023 में 42.16%, 2019 में 39.9%, 2018 में 44.6%, 2017 में 42.8%, 2016 में 36.9% और 2015 में 43.9% था। इस बार हाई कोर्ट की डिफेसमेंट पर लगाम के बाद दो महीने बाद रिजल्ट आया और तब तक स्टूडेंट्स की रिजल्ट को लेकर उत्सुकता खत्म भी हो गई। छात्र संगठनों खासतौर पर एनएसयूआई और एबीवीपी के सामने अगले साल से डूसू चुनाव बिना मनी-मसल्स पावर, पर्चों के ढेर, पटाखों, डीजे, महंगी कारों के काफिले के बगैर लड़ना बड़ा चैलेंज होगा।

1949 में बने डूसू में पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली, विजय गोयल, अजय माकन और कांग्रेस लीडर अलका लांबा डूसू प्रेजिडेंट रह चुके हैं, देश के कई नेता यूनियन के मेंबर रह चुके हैं।

 

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