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अगर पुरुषों को मासिक धर्म होता तो वे समझ जाते… महिला जजों को बर्खास्त करने पर सुप्रीम कोर्ट ने की अहम टिप्पणी

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नई दिल्ली

मध्य प्रदेश महिला जजों को टर्मिनेट करने के मामले में सुनवाई के सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ा और नाराजगी जताई। शीर्ष अदालत ने मंगलवार को राज्य में महिला सिविल जजों की सेवाएं समाप्त करने और उनमें से कुछ को बहाल करने से इनकार करने के लिए राज्य हाई कोर्ट की आलोचना की।

‘काश पुरुषों को मासिक धर्म होता’
जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की अगुवाई वाली दो जजों की पीठ ने कहा कि काश पुरुषों को मासिक धर्म होता, तभी वे समझ पाते। उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से राज्य में महिला सिविल जजों की सेवाएं समाप्त करने और उनमें से कुछ को बहाल करने से इनकार करने में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उदासीन रवैये का जिक्र किया।

मामले निपटाने के लिए टारगेट पर सवाल
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि विशेष रूप से महिलाओं के लिए, यदि वे शारीरिक और मानसिक रूप से पीड़ित हैं, तो यह मत कहिए कि वे धीमी हैं और उन्हें घर भेज दीजिए। पुरुष जजों और न्यायिक अधिकारियों के लिए भी यही मानदंड होने चाहिए, हम तब देखेंगे, और हम जानते हैं कि क्या होता है। उन्होंने कहा कि आप जिला न्यायपालिका के लिए टारगेट यूनिट (मामले निपटान की) कैसे बना सकते हैं? शीर्ष अदालत ने मामले में आगे की सुनवाई के लिए 12 दिसंबर की तारीख तय की।

इससे पहले 23 जुलाई, 2024 को सुप्रीम कोर्ट की इसी पीठ ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट को न्यायिक अधिकारियों की सेवाएं समाप्त करने के अपने फैसले पर एक महीने के भीतर पुनर्विचार करने को कहा था। साथ ही प्रभावित जज के अभ्यावेदन पर नए सिरे से विचार करने को कहा था।

क्या है मामला?
मध्य प्रदेश सरकार की तरफ से जून 2023 में छह जजों की सेवा समाप्ति के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया था। इस वर्ष जनवरी से सर्वोच्च न्यायालय इस मामले की सुनवाई कर रहा था। मामले में मध्य प्रदेश राज्य न्यायिक सेवा के सिविल जज, वर्ग- II (जेआर डिवीजन) की सेवा समाप्ति कर दी थी।

मध्य प्रदेश सरकार के राज्य विधि विभाग ने इन छह महिला जजों को बर्खास्त करने का आदेश पारित किया था। इसकी वजह थी किएक प्रशासनिक समिति और पूर्ण न्यायालय की बैठक में प्रोबेशन पीरियड के दौरान उनका प्रदर्शन असंतोषजनक पाया गया था।

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