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क्या धर्म के आधार पर हो सकता आरक्षण? सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

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नई दिल्ली

धर्म के आधार पर आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई और केवी विश्वनाथन की पीठ कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली अपीलों पर सुनवाई कर रही थी। कलकत्ता हाई कोर्ट ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के रूप में वर्गीकृत करने के पश्चिम बंगाल सरकार के फैसले को रद्द कर दिया था, ताकि वे आरक्षण का लाभ उठा सकें।

कपिल सिब्बल ने की बड़ी मांग
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने राज्य सरकार के फैसले को सही ठहराने की मांग की। इसपर जस्टिस गवई ने कहा, “आरक्षण धर्म के आधार पर नहीं हो सकता।” सिब्बल ने कहा कि ‘पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा) (सेवाओं और पदों में रिक्तियों का आरक्षण) अधिनियम, 2012’ के प्रावधानों को रद्द करने में कलकत्ता हाई कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट पर बहुत अधिक भरोसा किया था। इसी फैसले के कारण मुस्लिम ओबीसी के लिए आरक्षण को रद्द कर दिया। सिब्बल ने कहा आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है और अभी भी अंतिम निर्णय लंबित है।

वरिष्ठ वकील सिब्बल ने कहा कि राज्य द्वारा प्रदान किया गया आरक्षण धर्म पर आधारित नहीं है बल्कि पिछड़ेपन पर आधारित है जिसे न्यायालय ने बरकरार रखा है। पिछड़ापन सभी समुदायों में मौजूद है। उन्होंने कहा कि जस्टिस (रिटायर्ड) रंगनाथ मिश्रा आयोग ने मुसलमानों के लिए आरक्षण का समर्थन किया था और कहा कि उनमें से 44 समुदाय केंद्रीय ओबीसी सूची में हैं, जबकि बाकी को मंडल आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त है।

सिब्बल ने कहा कि हाई कोर्ट के फैसले के कारण ओबीसी के उप-वर्गीकरण को खत्म करने पर भी पड़ा। उन्होंने कहा कि तर्क का एक हिस्सा यह था कि एक्सरसाइज ठीक से नहीं किया गया था। जस्टिस गवई ने बताया कि पिछड़ापन दिखाने के लिए डेटा की आवश्यकता है। सिब्बल ने कहा कि हमारे पास डेटा है और यह छात्रों सहित बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित करता है।

सिब्बल ने बताया कि हाई कोर्ट के फैसले के कारण लगभग 12 लाख ओबीसी प्रमाणपत्र रद्द कर दिए गए हैं। सिब्बल की दलीलों का विरोध करते हुए, प्रतिवादियों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता पीएस पटवालिया ने कहा कि हाई कोर्ट ने पाया कि पिछड़ेपन का पता लगाने के लिए कोई सर्वेक्षण नहीं किया गया था और कोई डेटा नहीं था। उन्होंने कहा कि राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग को नजरअंदाज कर दिया गया और 2010 में तत्कालीन मुख्यमंत्री के एक बयान के बाद आरक्षण दिया गया। पटवालिया ने कहा कि हाई कोर्ट ने कहा था कि राज्य ऐसा कर सकता है लेकिन उचित प्रक्रिया का पालन करने के बाद ही।

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