पटना
बिहार के नए राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान बनाए गए हैं। तकरीबन तीन दशक बाद बिहार को कोई मुस्लिम राज्यपाल मिला है। ए आर किदवई के आखिरी बार बिहार के राज्यपाल थे। वे 1993 से 1998 तक बिहार के राज्यपाल रहे। आरिफ मोहम्मद खान बिहार के 41वें गवर्नर हैं। वे राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर की जगह लेंगे। आर्लेकर को केरल का राज्यपाल बनाया गया है। आरिफ मोहम्मद खान बिहार में नियुक्ति से पहले केरल के ही राज्यपाल थे। बिहार में अगले साल विधानसभा का चुनाव होना है।
चुनावी नजरिए की बात
खान की बिहार में नियुक्ति को चुनावी नजरिए से देखा जा रहा है। राज्यपालों का राजनीति से कोई सीधा सरोकार नहीं होता, लेकिन उनकी नियुक्ति राजनीतिक ही होती है। इसलिए वे अपने को राजनीति से विरले ही बचा पाते हैं। आरिफ मोहम्मद खान की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वे मुस्लिम कट्टरता के खिलाफ हैं। सीधे कहें तो वे प्रगतिशील विचारधारा के व्यक्ति हैं। उनकी उदारता के बारे में समझने के लिए उनका सिर्फ इस बयान काफी है। आम मुसलमानों से इतर वे मानते हैं कि दुनिया की पहली पुस्तक ऋग्वेद है।
भाजपा के पास बिहार में शाहनवाज हुसैन अभी तक एकमात्र बड़े मुस्लिम चेहरा हैं। पर, भाजपा जानती है कि पैन बिहार उनकी कोई इमेज नहीं है। यह अलग बात है कि नीतीश मंत्रिमंडल के वे सदस्य रह चुके हैं और उससे पहले बिहार से ही जीत कर केंद्र में भी मंत्री रहे हैं। फिलहाल वे भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ताओं में शामिल हैं। शाहनवाज भी प्रगतिशील विचारधारा के माने जाते हैं। भाजपा ने आरिफ मोहम्मद खान को राज्यपाल बना कर बिहार के मुसलमानों को यह संदेश देने की कोशिश की है कि वे उसे अछूत न समझें।
मुसलमानों के बीच बनेंगे कड़ी
राज्यपाल रहते आरिफ मोहम्मद खान भाजपा चुनाव प्रचार भले न कर पाएं, लेकिन समय-समय पर राज्यपाल अपने राजनीतिक लगाव का फायदा अपनी पृष्ठभूमि वाली पार्टियों को पहुंचाते रहते हैं। जब भी जोड़-तोड़ की सरकार बनाने की नौबत आती है, तब राज्यपाल अपनी पार्टी के पक्ष में ही खड़े दिखते हैं। वैसे भी आरिफ मोहम्मद की विचारधारा हिन्दुओं को तो भाती ही है, उदार और प्रगतिशील विचारधारा के मुसलमान भी उसे पसंद करते हैं। बिहार में मुसलमानों के हृदय परिवर्तन का खान बेहतर टूल साबित हो सकते हैं।
