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अगर बच्चे ही सही जानकारी नहीं दें तो… डेटा सुरक्षा पर एक्सपर्ट्स के पूछे 5 सवाल, गौर करे सरकार

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नई दिल्ली

डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन के ड्राफ्ट नियम 2025 को लेकर जिस बात को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है,वो है बच्चों के मद्देनज़र पैरेंट्स की सहमति वाले प्रावधान की। ऑनलाइन अकाउंट बनाने की अनुमति देने से लेकर बच्चों के डेटा प्रोसेसिंग को लेकर इसमें कई बातें हैं। सरकार का कहना है कि इन नियमों में बच्चों का खास ख्याल रखा गया है और इसलिए विशेष तौर एक मैकेनिजम खड़ा किया है, जिससे लेकिन जानकार कहते हैं कि ये फ्रेमवर्क ऐसी जमीन पर खड़ा है, जिसकी आधारशिला फिलहाल बहुत मजबूत नहीं दिखती। हालांकि धीरे धीरे ये फ्रेमवर्क धीरे धीरे और पुख्ता हो सकता है।

हालांकि जानकार मानते हैं कि इस फ्रेमवर्क का एक फायदा साइबर फ्रॉड और अपराधी तत्व पर काबू करने में होगा क्योंकि मौजूदा वक्त में कई ऐसे अपराधी हैं जो कि जो 18 साल से ज्यादा होने के बावजूद खुद को कम दिखाते हुए अकाउंट बनाते हैं । अब वेरिफिकेशन सिस्टम होने के बाद इस तरह के व्यवहार में भी कमी देखने को मिलेगी। बता दें कि फिलहाल ये नियम 18 फरवरी तक पब्लिक कंस्लटेशन के लिए जनता के सामने हैं। क्या हैं वो व्यावहारिक दिक्कतें या वो सवाल जो एक्सपर्ट उठा रहे हैं।

सेल्फ डिक्लेरेशन के आधार पर बना है फ्रेमवर्क ?
  • नियमों के मुताबिक 18 साल से कम उम्र के यूजर्स के लिए पैरेंट्स की सहमति अब जरूरी होगी, हालांकि उनके माता पिता या अभिभावक की वेरिफिकेशन का भी होगा, हालांकि ये पूरा सिस्टम एक चीज़ पर टिका है, कि बच्चे खुद ही बताएं कि वो बालिग नहीं है। यही सबसे पहले व्यावहारिक दिक्कत सामने आएगी। साइबर कानूनों के एक्सपर्ट विराग गुप्ता कहते हैं कि बच्चों की पहचान कैसे होगी ? क्या इसे लेकर बच्चों और अभिभावकों के डॉक्यूमेंट्स सोशल मीडिया कंपनियां इकट्ठा करेंगी। ऐसे में सोशल मीडिया कंपनियों से डाटा की सुरक्षा कैसे होगी ? रूल्स में इस बात पर कोई रोशनी नहीं डाली गई है कि विदेशों में रजिस्टर्ड कंपनियां इस मामले में कैसा रुख रखेंगी, क्योंकि वहां 13 साल से कम उम्र के बच्चे सोशल मीडिया ज्वाइन नहीं कर सकते।
बच्चे अगर सही जानकारी नहीं देते हैं तब क्या ?
  • साइबर मामलों के जानकार कनिष्क गौर कहते हैं कि ये सही है कि बच्चों की ओर से सेल्फ डिक्लेरेशन और माता पिता की वेरिफिकेशन के बाद कंसेट के जरिए एक ढांचा खड़ा करने की कोशिश की तो गई है, लेकिन सोचने वाली बात ये भी है कि हम बच्चों से कह रहे हैं कि वो सेल्फ डिक्लेरेशन दें, या खुद ही मानें कि वो 18 साल से कम नहीं हैं। अगर वो जानबूझकर या बिना जाने ऐसा नहीं करते हैं, और अपनी उम्र छुपाते हैं तो उस स्थिति से कैसे निबटा जाएगा। ऐसे में बिना तगड़ी वेरिफिकेशन सिस्टम के ये फेल हो सकता है। हालांकि वो कहते हैं कि देश में ऐसा डिजिटल वेरेफिकेशन सिस्टम डिजी लॉकर जैसे कदमों के तहत पैदा किया जा सकता है।
डिजिटल साक्षरता आड़े आएगी तब ?
  • पिछले साल नवंबर 2024 में Centre For Economic and Social Studies (CESS) में सामने आई एक स्टडी बताती है कि भारत में महज 15 साल से ऊपर महज 12 फीसदी लोग ही कंप्यूटर लिटरेट हैं। हालांकि इन नियमों के केंद्र में ऐसी सोच दिखती है कि पैरेंट्स बच्चों से ज्यादा डिजिटली साक्षर हैं। वहीं कई जानकार ये भी कहते हैं कि उम्र के बंधन लगाए जाने का सबसे ज्यादा नुकसान उस वर्ग को हो सकता है, जो पहले से ही डिजिटल तौर पर पिछड़ा है। CESS की ही स्टडी बताती है कि आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में पढ़े लिखे लोग भी ईमेल जैसे काम करने में दिक्कत महसूस करते हैं । वहीं महिलाओं में इस तरह की परेशानियां ज्यादा देखने को मिली। ऐसे में इन रूल्स के लागू होने के बाद डिजिटल गैप के बढ़ जाने की आशंका है। डॉ कर्निका ए सेठ कहती हैं कि यहां ऐसे बच्चों के माता पिता को अपनी सहमति देने में परेशानी महसूस हो सकती है, जिससे कि जो वर्ग डिजिटल डिवाइड का पीड़ित है, उसके लिए ज्यादा फायदे का सौदा नहीं होगा।
बच्चों का डेटा सेंसिटिव क्यों ना करार दिया जाए ?
  • डॉ कार्निका कहती हैं कि दूसरी कैटेगरी की ही तरह बच्चों से जुड़ा डेटा भी सेंसिटिव करार दे देना चाहिए। क्योंकि ऐसा ना होने की स्थिति में इस डेटा के देश से बाहर जाने की आशंका बनी रहेगी। इसके अलावा वो ये भी कहती हैं कि दिव्यांग जनों के डेटा मामले में भी अभिभावक या लीगल प्रतिनिधि के तौर पर एक मैकेनिज्म बनाया जाना चाहिए, जिसका फिलहाल रूल्स में जिक्र नहीं है।
पैरेंट्स के अकाउंट को लेकर स्पष्टता नहीं
  • जानकार ये भी मानते हैं कि जो फिलहाल रूल्स दिखाई देते हैं उसमें उन वेरिफाइड पैरेंट्स के अकाउंट को लेकर कुछ नहीं कहा गया है, जिन्हें बच्चों के अकाउंटस से जोड़ा जाएगा। उस डेटा को किस तरह रेगुलेट किया जाएगा, इस पर कोई स्पष्टता नहीं है।

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