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अनंत सिंह पर इतने क्यों मेहरबान नीतीश? सुशासन राज में घुटने पर आए बाहुबली, लेकिन आज भी ‘दहाड़’ रहे छोटे सरकार

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पटना

बाहुबली अनंत सिंह क्या सचमुच में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के काफी करीब हैं? यह सवाल राजनीतिक गलियारों में अक्सर गूंजती है। तर्क दिया जाता है कि कभी नीतीश कुमार के खास रहे सुनील पाण्डेय, मुन्ना शुक्ला, सूरजभान सिंह जैसे बाहुबली का रंग क्रमशः उतरते ही जा रहा है। बाहुबल पर चुनाव जीतने का तिलिस्म भी टूटता जा रहा है। पर अनंत सिंह का जलवा बरकरार रहने के पीछे आखिर क्या वजह है? सवाल यह भी उठता है कि अभी भी जीत के दम खम रखने वाले अनंत सिंह के लिए पार्टी कोई मायने नहीं रखता। आखिर क्या है अनंत सिंह के राजपाट कायम रहने का राज? जानते हैं…।

होता रहा नीतीश कुमार के करीबी होने का भान
अब इसे संयोग कह लें या दलीय राजनीति की विवशता, पर ऐसे कई मौके आए जहां नीतीश कुमार ने उपस्थित होकर अनंत सिंह के कद को बड़ा कर गए।

वर्ष 2004: अनंत सिंह के लिए काफी महत्वपूर्ण रहा। दरअसल, वह मौका था लोकसभा चुनाव 2004 का। उस वक्त नीतीश कुमार और अनंत सिंह करीब आए। यहीं से दोस्ती की पटकथा का लिखा जाना शुरू हुआ। अनंत सिंह ने न केवल बाहुबल से मदद किया, बल्कि एक जनसभा में अनंत सिंह ने चांदी के सिक्कों से नीतीश कुमार को क्या तौल डाला इलाके में अनंत सिंह की उपस्थिति का मतलब नीतीश कुमार ही समझने लगे। जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने तो अनंत सिंह का कद बढ़ना ही था।

सत्ता के संरक्षण का असर दिखाने लगा था। अंजाम यह हुआ कि अनंत सिंह जेडीयू के टिकट पर चुनाव में उतरे और पहली बार 1700 वोटों से जीते। इसी साल अक्टूबर नवंबर में हुए चुनाव में अनंत सिंह ने एक बार फिर से जेडीयू के टिकट पर जीत दर्ज की और अंतर को काफी बड़ा कर लिया था।

वर्ष 2010: में एक बार फिर से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और अनंत सिंह के बीच गहरे संबंध की अभिव्यक्ति तब हुई जब जेडीयू ने एक बार फिर से बाहुबली नेता को मोकामा विधान सभा सीट से उम्मीदवार घोषित कर दिया। वह अपने दम खम से लगातार तीसरी बार चुनाव भी जीत गए।

वर्ष 2024: दो घटनाओं का भी असर नीतीश कुमार और अनंत सिंह के संबंधों पर पड़ा। यह था न्याययिक प्रक्रिया के तहत अनंत सिंह का जेल से बाहर आना। तब नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया कि नीतीश कुमार फ़साते भी हैं और निकालते भी हैं। इस आरोप के पीछे तेजस्वी यादव का तर्क भी था कि सबूत के अभाव में वह जेल से बाहर निकले। सबूत देना तो प्रशासन का काम है।

यह भी चर्चा उड़ी कि अनंत सिंह मुंगेर लोकसभा से ललन सिंह उर्फ राजीव रंजन सिंह को जीत दिलाने में काफी मदद की। बाहुबली अशोक महतो के विरुद्ध उस इलाके में काफी दृढ़ता के साथ अनंत सिंह लगे रहे और ललन सिंह को जीत मिली। इस दौरान जब एक पत्रकार ने पूछा कि पहले आप नीतीश कुमार को चांदी से तौले थे अब क्या सोना से तौलियेगा? अनंत सिंह का जवाब हां में था।

सांप छुछुंदर वाली गति
लेकिन जिस तरह से अनंत सिंह और सोनू-मोनू गैंग के बीच एक बार गैंगवार का खुला खेल खेला गया यह नीतीश कुमार की राजनीतिक यूएसपी पर सीधा सीधा हमला था। अब इसे यूज एंड थ्रो की नीति कहें या फिर एक हद से ज्यादा झुकने की प्रवृति का नहीं रहना।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सुशासन कुमार की भूमिका का निर्वहन किया। अब कानून अपना काम करेगी। 2010 में भी जब वह जदयू के टिकट पर विधायक बने उस दौरान जब कई मामलों में अनंत सिंह उलझा गए तो तब भी नीतीश कुमार का वही स्टैंड रहा और उनपर मुकदमे दर्ज हुए। कई बार जेल भी गए।

कहा जाता है कि इन कारणों से नीतीश कुमार और अनंत सिंह की बीच दूरी आई। 2015 के चुनाव में जेडीयू ने टिकट नहीं दिया। जब नीतीश की पार्टी ने उन्हें टिकट देना नहीं दिया तो वह निर्दलीय चुनाव लड़े और जीते। लेकिन कई मामलों में जेल में होने की वजह से वह विधायक पद की शपथ नहीं ले पा रहे थे। बाद में हाईकोर्ट के आदेश पर उन्हें शपथ दिलाई गई थी।

कानून अपना काम करेगी
नौरंगा में घटी घटना निश्चित तौर पर बाहुबली की टकराहट के अलावा कुछ नहीं। समझ लीजिए मोकामा में वर्चस्व की लड़ाई की शुरुआत हो गई। इधर इस आग से दूर नीतीश कुमार ने ऐन चुनावी मौके पर सुशासन का दामन थामकर तेजस्वी यादव को संदेश देने का काम किया।

दरअसल, तेजस्वी यादव ने बिहार की राजनीति में यह कहकर भूचाल ला दिया कि राष्ट्रीय जनता दल (RJD) आगामी विधान सभा चुनाव में कोई भी आपराधिक पृष्ठभूमि वालों को टिकट नहीं दिया जाएगा।2010 में भी जब विधायक अनंत सिंह पर कई मामले दर्ज हुए और जेल गए तब भी नीतीश कुमार ने अनंत सिंह को कोर्ट के भरोसे छोड़ दिया था।

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