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तालिबान के राजदूत की दिल्ली में तैनाती.. क्या भारत की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा रही अफगान नीति?

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काबुल

मीडिया रिपोर्ट्स में दावे किए गये हैं कि जल्द ही भारत दिल्ली में तालिबान के राजदूत की नियुक्ति को मंजूरी देने वाला है। यानि ये पहली बार होगा जब दिल्ली में तालिबान के राजदूत की मौजूदगी होगी। जिसको लेकर एक्सपर्ट्स आशंका जता रहे हैं कि दिल्ली की ‘अफगान नीति’ भारत की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकती है। एक्सपर्ट्स का आग्रह है भारत सरकार दिल्ली में तालिबान के राजदूत की नियुक्ति की इजाजत ना दे। एक्सपर्ट्स ने नई दिल्ली से काबुल शासन के साथ संबंधों को सामान्य नहीं बनाने का आग्रह किया है। आपको बता दें कि अफगानिस्तान की मीडिया के साथ साथ तालिबान विदेश मंत्रालय और ब्लूमबर्ग ने भी रिपोर्ट दी है कि तालिबान के राजदूत की नियुक्ति देने के लिए भारत तैयार हो गया है।

माना जा रहा है कि 8 जनवरी को दुबई में भारतीय विदेश सचिन विक्रम मिसरी और तालिबान के कार्यवाहक विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी के बीच हुई बैठक में ये फैसला लिया गया था। अगस्त 2021 में काबुल में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से ये पहला मौका था जब भारतीय विदेश मंत्रालय के किसी उच्चाधिकारी ने तालिबान के विदेश मंत्री के साथ बैठक की हो।

तालिबान के साथ करीबी संबंध बना रहा भारत?
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक नवंबर 2024 मुंबई में स्थिति अफगानिस्तान महावाणिज्य दूतावास में इकरामुद्दीन कामिल की नियुक्ति को भारत सरकार ने मंजूरी दी थी। इकरामुद्दीन कामिल की नियुक्ति तालिबान ने की थी। ऐसे में अब अगर दिल्ली में भी तालिबान के दूत की नियुक्ति की मंजूरी भारत सरकार देती है, तो भारत, चीन, पाकिस्तान, रूस, ईरान, यूएई, कतर और मध्य एशियाई राज्यों सहित उन देशों की लिस्ट में शामिल हो जाएगा, जिन्होंने तालिबान के साथ संबंध बनाए हैं। आपको बता दें कि इससे पहले ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान, दक्षिण कोरिया, फ्रांस समेत कम से कम 16 देशों से तालिबान की तरफ से नामित नियुक्तियों को खारिज कर दिया था। हालांकि पहले भारत ने भी यही स्टैंड लिया था लेकिन पिछले साल से भारत की नीति में बदलाव देखने को मिला है।

अफगानिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ स्ट्रैटेजिक स्टडीज (लंदन) की तरफ से मैड्रिड में आयोजित हेरात सुरक्षा वार्ता में द हिंदू से बात करते हुए पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों और राजनयिकों ने आह्वान किया है कि भारत, तालिबान के दूतों की नियुक्तियों को स्वीकार ना करे। र्व अफगान राजदूत अशरफ हैदरी ने कहा कि “यह बदलाव भारत के एतिहासिक अफगान नीति से बिल्कुल अलग है। जो एक जिम्मेदार राष्ट्र के तौर पर भारत की विश्वसनीयता को कमजोर करेगा, जिसने हमेशा से आतंकवाद के किसी भी रूप की निंदा की है।” उन्होंने कहा कि “अफगानिस्तान के लोगों को उम्मीद है कि भारत अपनी घोषित विदेश नीति को बनाए रखेगा, जिसमें ‘अच्छे या बुरे’ आतंकवाद के हर रूप की निंदा की गई है।”

हालांकि द हिंदू ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि अगर भारत तालिबान के दूत की नियुक्ति को स्वीकार भी कर लेता है, फिर भी भारत तालिबान को अपने झंडे का इस्तेमाल नहीं करने देगा। तालिबान के दूतावास में अफगानिस्तान का पुराना झंडा ही लगा रहेगा। तालिबान के दूत की नियुक्ति को लेक ये भारत की सबसे प्रमुख शर्त होगी।

क्या भारत उठा रहा व्यावहारिक कदम?
हालांकि अफगानिस्तान में अमेरिका के पूर्व राजदूत रयान क्रॉकर के विचार थोड़े अलग हैं। उनका कहना है कि भारत और अन्य देश तालिबान शासन के साथ कुछ जुड़ाव बनाए रखने के लिए “व्यावहारिक कदम” उठा रहे हैं। हालांकि उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि तालिबान शासन को मान्यता नहीं मिलनी चाहिए। हेरात सुरक्षा वार्ता में बोलते हुए क्रॉकर ने कहा, कि “यदि कोई देश तालिबान शासन को मान्यता देता है, तो वह तालिबान शासन और उसके घृणित कामों की वैधता का समर्थन करेगा और यह एक ऐसा कदम है, जिसे इंटरनेशनल कम्युनिटी को नहीं उठाना चाहिए।”

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