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मास्टर स्ट्रैटेजिस्ट’ अब सिर्फ ‘वोटकटवा’! क्या PK का राजनीतिक करियर खत्म हो रहा है? बिहार चुनाव देते हैं संकेत

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पटनाः

बिहार में पिछले दो सालों से घूम-घूम कर बड़े दावे कर रहे प्रशांत किशोर (पीके) अब मुख्यधारा की राजनीति से बाहर होते दिख रहे हैं। पहले बिहार में विधानसभा उपचुनाव और फिर विधान परिषद उपचुनाव के बाद अब पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव के नतीजे भी यही कहानी कह रहे हैं। बिहार विधानसभा की 4 सीटों पर हुए उपचुनाव और विधान परिषद उपचुनाव में भी पीके और उनकी पार्टी जनसुराज ‘वोटकटवा’ साबित हुई। वहीं पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में जनसुराज ने पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन नतीजा उनके पक्ष में नहीं आया।

छात्र संघ चुनाव में पीके पार्टी ने खूब लगाई ताकत
पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में पीके की पार्टी जन सुराज ने अपने उम्मीदवार उतारे थे और खूब ताकत लगाई थी। छात्रसंघ के चुनाव में कई पार्टियों के छात्र संगठन मैदान में थे। लेकिन जनसुराज के अलावा किसी और राजनीतिक पार्टी ने ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई। बताया जाता है कि पीके की पार्टी ने इस चुनाव में खूब पैसा खर्च किया।

प्रशांत किशोर का पटना यूनिवर्सिटी से पुराना नाता है, जब वो जेडीयू से जुड़े थे तो उन्होंने छात्र जेडीयू को छात्र संघ चुनाव में जिताने की रणनीति बनाई थी। उस समय पीके इतने बेचौन थे कि वे छात्र संघ चुनाव के दौरान पटना यूनिवर्सिटी के वीसी के घर तक पहुंच गए थे। इस बात पर दूसरे छात्र संगठनों ने खूब हंगामा किया था।

29 मार्च को पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ के पांच पदों के लिए वोटिंग हुई थी। पीके की पार्टी जन सुराज ने सभी पांच सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। लेकिन अध्यक्ष पद के लिए जनसुराज के उम्मीदवार का नामांकन रद्द हो गया था। चुनाव के नतीजे में अध्यक्ष पद पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने जीत हासिल की. उपाध्यक्ष और महासचिव पद पर निर्दलीय उम्मीदवार जीते। संयुक्त सचिव और कोषाध्यक्ष पद पर कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई की जीत हुई। छात्र संघ चुनाव में दो निर्दलीय उम्मीदवार जीते, लेकिन पीके की पार्टी के उम्मीदवारों का प्रदर्शन बहुत खराब रहा।

अध्यक्ष पद के लिए एनएसयूआई को समर्थन बेअसर
किसी भी पार्टी से समझौता नहीं करने का दावा करने वाले पीके ने पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में कांग्रेस का समर्थन किया था। अध्यक्ष पद के लिए जनसुराज के उम्मीदवार का नामांकन रद्द होने के बाद जन सुराज पार्टी ने इस पद के लिए एनएसयूआई को समर्थन देने का ऐलान किया था। लेकिन फिर भी एनएसयूआई का उम्मीदवार अध्यक्ष पद का चुनाव नहीं जीत पाया।

3 चुनावों में ‘वोटकटवा पार्टी’ की इमेज बनी
पिछले तीन चुनावों में पीके की पार्टी का जो हाल हुआ है, उससे उनकी इमेज ‘वोटकटवा पार्टी’ की बन गई है। लगभग पांच महीने पहले बिहार की चार विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए थे। पिछले साल नवंबर में हुए उपचुनाव में पीके ने अपनी ताकत दिखाने का ऐलान किया था। उनकी पार्टी जनसुराज ने चारों सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे।

उपचुनाव में पीके की पार्टी का हाल शुरू से ही खराब था। नाम घोषित करने के बाद चार में से दो सीटों पर उम्मीदवार बदलने पड़े। जब वोटिंग के बाद रिजल्ट आया, तो पता चला कि जनसुराज सिर्फ वोट काटने वाली पार्टी साबित हुई है। तरैया, रामगढ़, बेला और इमामगंज में हुए उपचुनाव में पीके ने पूरी ताकत झोंकी थी। लेकिन जब रिजल्ट आया, तो पता चला कि तरैया और रामगढ़ में पीके की पार्टी जनसुराज एनडीए के कुछ वोट काटने में सफल रही।

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