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फारूक अब्दुल्ला राष्ट्रवादी, 370 हटाने का गुप्त समर्थन, पूर्व रॉ चीफ दुलत के दावे में कितना दम है?

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चंडीगढ़

रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के चीफ रहे एएस दुलत के फारूक अब्दुल्ला को लेकर किए दावे ने कश्मीर ही नहीं, देश में खलबली मचा रखी है। दुलत ने अपनी नई किताब ‘चीफ मिनिस्टर एंड द स्पाई’ में दावा किया है कि जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने पर्दे के पीछे अनुच्छेद 370 हटाने का समर्थन किया था, मगर बाहरी तौर पर वह इसका विरोध करते रहे। दुलत ने फारूक अब्दुल्ला को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी करार दिया। अमरजीत सिंह दुलत के दावों का नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला ने पब्लिसिटी स्टंट करार दिया। अब सवाल यह है कि लंबे समय तक इंटेलिजेंस से जुड़े एएस दुलत पर भरोसा क्यों नहीं किया जा सकता है? दुलत पहले भी अपनी किताब ‘ए लाइफ इन द शैडोज ए मेमॉयर’ में कश्मीर और अब्दुल्ला परिवार के बारे में लिख चुके हैं।

दुलत के खुलासे से अब्दुल्ला परिवार पर विपक्ष का हमला
पूर्व रॉ चीफ ए एस दुलत ने दावा किया कि 370 हटाने के बाद अब्दुल्ला इसलिए निराश थे कि दिल्ली के करीब होने के बाद भी उन्हें भरोसे में नहीं लिया। इस खुलासे बाद कश्मीर में फारूक अब्दुल्ला की आलोचना का दौर शुरू हुआ। पीडीपी नेता इल्तिजा मुफ्ती ने कहा कि अब्दुल्ला परिवार के करीबी ने सच उजागर किया है। दुलत साहब नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता फारूक साहब को उन्हें अंदर-बाहर से जानते हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने निजी तौर पर अनुच्छेद 370 को हटाने का समर्थन किया था, इसीलिए फारूक साहब संसद नहीं जाना चाहते थे। क्योंकि उन्हें 2019 में पता था कि अगर वह संसद गए, तो उन्हें अनुच्छेद 370 को हटाने के खिलाफ बात करनी होगी। जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के प्रमुख सज्जाद लोन ने कहा कि दुलत दिल्ली में फारूख अब्दुल्ला के वकील रहे हैं। उन्हें 370 को लेकर किए गए खुलासे से हैरानी नहीं हुई। विपक्ष ने आरोप लगाया कि 370 के समर्थन के कारण ही नेशनल कॉन्फ्रेंस को सरकार बनाने का इनाम मिला।

पहले कई राजनेताओं और घटनाओं पर लिख चुके हैं दुलत
बयानबाजी के बीच फारूक अब्दुल्ला की बेटी साफिया अब्दुल्ला खान ने दुलत के दावों को झूठ बताया है। मगर दुलत के प्रफेशनल कैरियर को देखें तो दावों को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है। उन्होंने पहले अपनी किताब ‘ए लाइफ इन द शैडोज ए मेमॉयर’ में लाल कृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, कांग्रेस-बीजेपी नेताओं के रिश्ते, अजित डोभाल, सिख विरोधी दंगे, ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बीच तल्खी का भी जिक्र किया, जिसका कभी खंडन नहीं किया गया। 2002 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के बाद पीडीपी और कांग्रेस के गठबंधन पर भी उन्होंने टिप्पणी की, मगर विवाद नहीं हुआ। दुलत कश्मीर में लंबे समय तक सक्रिय रहे। अलगाववादी नेताओं और सरकार के बीच संवाद का जरिया बने।

16 साल तक सिर्फ कश्मीर को देखते रहे ए एस दुलत
एएस दुलत का कश्मीर के लिए काम करने का लंबा अनुभव है। 1965 में बतौर आईपीएस सर्विस जॉइन करने वाले वह मार्च 1969 में इंटेलिजेंस ब्यूरो में शामिल हो गए। 1988 से 1990 तक दुलत कश्मीर में उस समय आईबी के जॉइंट डायरेक्टर रहे, जब आतंकवाद सिर उठा रहा था। 1988 में पहली बार उनकी श्रीनगर में पोस्टिंग हुई। वह आईबी के ऐसे पहले अफसर थे, जो अलगाववादी नेताओं, अधिकारियों, नौकरशाहों और राजनयिकों से सीधी बात करते रहे।

1991 में केंद्र सरकार ने उन्हें कश्मीरी अलगाववादियों से बात करने की आधिकारिक जिम्मेदारी सौंपी थी। उन्होंने 1996 में सरकार के इशारे पर शब्बीर शाह को विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए मनाने की कोशिश की थी। 1999 में वाजपेयी सरकार के दौरान वह रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के चीफ बने। 2000 में रिटायरमेंट के बाद दुलत को प्रधानमंत्री वाजपेयी के पीएमओ में कश्मीर मामलों के सलाहकार नियुक्त किया गया। इसके बाद वह चार साल तक कश्मीर की करीब से मॉनिटरिंग की।

पूर्व रॉ चीफ के विशेषज्ञता के कायल रहे अटल बिहारी
दुलत की कश्मीर को लेकर विशेषज्ञता के कायल देश के कई प्रधानमंत्री रहे। उन्होंने जिक्र किया था कि खुफिया जानकारी की कमी की वजह से कश्मीर में अलगाववाद की आग भड़की। इसके बाद भी वर्षों तक बड़ी गलतियां हुईं, जिसके कारण कश्मीर में कट्टरता और आतंकवाद बढ़ा। दुलत की सलाह पर ही अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने कश्मीर में हीलिंग टच की पॉलिसी शुरू की। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नरम गुट से बातचीत के रास्ते खुले। हिज्बुल मुजाहिदीन में भी फूट पड़ी और माजिद डार गुट बातचीत के लिए आगे आया था। अपनी किताब में दुलत ने फारूक अब्दुल्ला की तारीफ भी की। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में अब्दुल्ला

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