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2 करोड़ रुपये की रिश्वत आखिर किसे मिली? AAP इलेक्शन फंडिंग की जांच में जुटी ईडी

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नई दिल्ली

प्रवर्तन निदेशालय (ED) दिल्ली जल बोर्ड (DJB) मामले में कथित तौर पर दिए गए 2 करोड़ रुपये के किकबैक के ‘अंतिम लाभार्थियों’ की जांच कर रहा है। ED यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इस रिश्वत का असली फायदा किसे हुआ। आरोप है कि इस रकम का इस्तेमाल आम आदमी पार्टी (AAP) ने चुनाव में फंडिंग के लिए किया। सूत्रों ने ET को यह जानकारी दी है।

प्रवर्तन निदेशालय 2.01 करोड़ रुपये की जांच कर रहा है। आरोप है कि यह रकम दिल्ली जल बोर्ड (DJB) के कई अधिकारियों और AAP के चुनाव प्रचार के लिए अलग-अलग लोगों को ट्रांसफर की गई। ताजेंदर पाल सिंह नाम के एक चार्टर्ड अकाउंटेंट इस मामले में आरोपी थे। पिछले साल दिसंबर में दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें सरकारी गवाह बनने की इजाजत दे दी।

पेन ड्राइव में सीक्रेट कोड का राज
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सिंह ने एक पेनड्राइव दी है। इसमें कुछ कोड हैं, जिन्हें सिर्फ वही समझ सकते हैं। यह पेनड्राइव ED के लिए इस मामले में मनी ट्रेल को जोड़ने के लिए बहुत जरूरी है। सिंह ने पहले सेशन कोर्ट में सरकारी गवाह बनने की अर्जी दी थी, जिसे अगस्त 2024 में खारिज कर दिया गया था।

सेशन कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए हाई कोर्ट ने दिसंबर में कहा कि अभियोजन पक्ष सिंह को गवाह के तौर पर पेश करना चाहता है। साथ ही, इस बात पर भी राजी है कि उन्हें माफ कर दिया जाए। सिंह से जो सबूत मांगे गए हैं, उनकी क्वालिटी और क्वांटिटी को ध्यान में रखते हुए सेशन कोर्ट का यह कहना सही नहीं था कि अभियोजन एजेंसी की संतुष्टि में दखल दिया जाए।

सब-कॉन्ट्रैक्टर को जमानत मिली
एक और घटनाक्रम में, दिल्ली हाई कोर्ट ने पिछले हफ्ते अनिल कुमार अग्रवाल नाम के एक सब-कॉन्ट्रैक्टर को जमानत दे दी। अग्रवाल भी इस मामले में आरोपी हैं। अग्रवाल पर आरोप है कि उन्होंने मेसर्स NKG इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के पक्ष में फर्जी परफॉर्मेंस सर्टिफिकेट दिए थे। इसी के आधार पर कंपनी को DJB का कॉन्ट्रैक्ट मिला था। ED का आरोप है कि अग्रवाल ने सह-आरोपी जगदीश कुमार अरोड़ा को रिश्वत दी थी। अरोड़ा उस समय DJB के चीफ इंजीनियर थे। यह रिश्वत NKG इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड को गैरकानूनी तरीके से कॉन्ट्रैक्ट दिलाने के लिए दी गई थी।

लेकिन अग्रवाल के वकील विजय अग्रवाल ने दलील दी है कि ED ने कुछ एक्सेल स्प्रेडशीट पर भरोसा किया है, जो गलत है। वकील ने कहा कि स्प्रेडशीट में कोई प्रमाण नहीं है, यह किसने बनाई है, इसका कोई पता नहीं है और न ही कोई सहायक सामग्री है। इसलिए ये सिर्फ कागज के टुकड़े हैं। बचाव पक्ष के वकील ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष का मामला पूरी तरह से ताजेंदर पाल सिंह के बयानों पर टिका है। सिंह ने खुद माना है कि वह कथित साजिश में शामिल थे। बचाव पक्ष के वकील ने कहा कि सिंह की गवाही एक साथी अपराधी की गवाही है, इसलिए इस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

फर्जी एंट्री के जरिए करोड़ों रुपये ठिकाने लगाए
दूसरी ओर, ED के वकील ने कहा कि आरोपी अनिल अग्रवाल ने कॉन्ट्रैक्ट के सिलसिले में 8.38 करोड़ रुपये के अपराध की कमाई को फर्जी एंट्री के जरिए ठिकाने लगाया। हाई कोर्ट ने कहा कि अग्रवाल एक साल से ज्यादा समय से जेल में हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर मुकदमे में देरी हो रही है, तो यह जमानत देने का एक मजबूत आधार हो सकता है।

कोर्ट ने कहा कि ED की चार्जशीट 122 वॉल्यूम में है, जिसमें 15,750 से ज्यादा पेज हैं। CBI की चार्जशीट 209 वॉल्यूम में है, जिसमें 14,385 पेज, 101 गवाह और कई तरह के दस्तावेज हैं। हाई कोर्ट ने कहा कि इससे साफ है कि दोनों मुकदमों में बहुत सारे दस्तावेज होंगे और प्रक्रिया भी बहुत जटिल होगी। आरोप तय करने, समन जारी करने, गवाहों से पूछताछ करने, CrPC की धारा 313 के तहत बयान दर्ज करने और अंतिम बहस पूरी करने में काफी समय लगेगा।

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