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अधिकारों पर अतिक्रमण के आरोप लग रहे, लेकिन… जानिए सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा?

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नई दिल्ली

बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर जमकर बयानबाजी की। इसका असर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई एक सुनवाई पर भी दिखाई दिया। याचिका में OTT प्लेटफॉर्म पर अश्लील कंटेंट को रोकने के लिए कदम उठाने की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने आशंका जताई कि उस पर विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में ‘अतिक्रमण’ करने के आरोप लग रहे हैं।

अगले महीने देश के चीफ जस्टिस की कुर्सी संभालने जा रहे जस्टिस बीआर गवई ने भी इस मामले की सुनवाई की। जस्टिस एजी मसीह की बेंच के साथ उन्होंने कहा कि इस मामले में कोर्ट का अधिकार सीमित हो सकता है। जस्टिस गवई ने कहा कि यह मामला या तो विधायिका या कार्यपालिका के लिए है। ऐसे में हम पर विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण करने के आरोप लग रहे हैं। फिर भी, हम नोटिस जारी करेंगे।

राष्ट्रीय कंटेंट कंट्रोल अथॉरिटी की मांग
दरअसल, याचिकाकर्ता का कहना है कि OTT प्लेटफॉर्म आजकल बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं। इन प्लेटफॉर्म पर कई तरह के कंटेंट उपलब्ध हैं। कुछ कंटेंट अश्लील भी होते हैं। इन अश्लील कंटेंट को रोकने के लिए सरकार को कदम उठाने चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने OTT और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अश्लील कंटेंट को रोकने के लिए एक राष्ट्रीय कंटेंट कंट्रोल अथॉरिटी बनाने के लिए दिशानिर्देशों की मांग की। बेंच ने केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि सरकार को याचिका में उठाए गए मुद्दे पर कार्रवाई करनी चाहिए। मेहता ने कोर्ट को बताया कि इस संबंध में कुछ नियम मौजूद हैं, जबकि कुछ पर विचार किया जा रहा है।

याचिका पर आगे होगी सुनवाई
कोर्ट ने केंद्र सरकार को OTT प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया कंपनियों, जिनमें X Corp, Netflix, Amazon, Ullu Digital, ALTBalaji, MUBI, Google, Apple और Meta शामिल हैं, को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया। इसके बाद याचिका को आगे की सुनवाई के लिए पोस्ट कर दिया गया।

राज्यपाल के खिलाफ सुनाया था फैसला
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि के खिलाफ फैसला सुनाया था। मामला राज्य की DMK सरकार ने दायर किया था। कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत आरएन रवि को राज्य विधानसभा से पारित 10 विधेयकों को मंजूरी देने में देरी के लिए फटकार लगाई थी।

राज्यपाल की अनुमति के बिना
अपने फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के ‘असंवैधानिक’ कार्यों की कड़ी आलोचना की थी। तमिलनाडु में सत्तारूढ़ DMK ने सभी 10 विधेयकों को सरकारी गजट में कानून के रूप में अधिसूचित किया था। यह मामला भारत के संघीय इतिहास में एक ऐतिहासिक घटना थी, जिसमें राज्य के विधेयक राज्यपाल की सहमति के बिना कानून बन गए थे।

‘सुपर संसद’ की हुई थी आलोचना
इस घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट और कार्यपालिका के बीच टकराव शुरू हो गया था। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अनुच्छेद 142 के इस्तेमाल को ‘परमाणु मिसाइल’ बताया था। राज्यसभा के सभापति ने भी कोर्ट को ‘सुपर संसद’ के रूप में काम करने पर आलोचना की थी।

विपक्षी नेताओं ने की थी आलोचना
हालांकि, विपक्षी नेताओं ने धनखड़ की प्रतिक्रिया की कड़ी आलोचना की थी। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस (TMC), DMK और कई कानूनी विशेषज्ञों ने उपराष्ट्रपति पर न्यायपालिका को कमजोर करने और ‘अवमानना की सीमा’ तक जाने का आरोप लगाया था।

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