भोपाल की युवा गायिका अनुश्री संगमनेकर ने मन मोह लेने वाले गायन से जो शुरुआत की उसे पुणे से आई उर्वशी शाह ने साधना से तैयार परिष्कृत गायन से संगीत सभा को उचाईयों तक पहुंचाया.अवसर था संस्कार भारती के सहयोग से कला समूह भोपाल द्वारा आयोजित शास्त्रीय संगीत को समर्पित संगीत सभा “वीणा-स्मरण” के आयोजन का.
ग्वालियर घराने की मुर्धन्य गायिका विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे की स्मृति में आयोजित इस वार्षिक आयोजन में मंच पर सबसे अनुश्री ने राग मारु बिहाग में दो बंदिशे प्रस्तुत की. विलंबित रचना ” सकल गुनी जाने ” एकताल में और मध्यलय रचना ” गाउँ गुणन कैसे तुमरों” एकताल में निबद्ध थी. अनुश्री के स्वरों के उतार चढ़ाव और लयकारी को उपस्थित सुधी श्रोताओं ने काफ़ी सराहा. अनुश्री ने अपने गायन का समापन सुप्रसिद्ध भजन “बाजे रे मुरलिया बाजे” से किया. अनुश्री के साथ तबले पर अभय मिश्रा और हारमोनियम पर राजेश भट ने सुमधुर संगत की. तत्पश्चात मंच पर आई पुणे से पधारी उर्वशी शाह जिन्होंने अपने गायन का आरम्भ राग शंकरा से किया एकताल में रची विलंबित रचना ” अनहत नाद को भेद बखाने” और तीनताल में रचित द्रुत बंदिश “शंकर भण्डार खोले” माहौल को संगीत की अनंत यात्रा में लें जाने का माध्यम बने.
उल्लेखनीय है कि उर्वशी शाह वीणा सहसत्र बुद्धे की ही शिष्या है. गुरु के चरणों में अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उर्वशी ने राग जोग में दो बंदिशे प्रस्तुत की. मध्यलय झपताल की बंदिश ” बात बनावत” थी और तराना तीनताल में निबद्ध था. गायन का समापन करते हुए उर्वशी ने राग चारुकेशी पर आधारित निर्गुणी भजन “सिद्ध भजो” से श्रोताओं को आध्यात्म के संसार में भी विचरण कराया. आपके साथ तबले पर डॉ. अशेष उपाध्याय और हारमोनियम पर मुनि मालवीय ने सधी हुई संगत की. आयोजन में भोपाल के अनेक संगीत गुरु, कलासाधक और रसिकगण उपस्थित थे. कला समूह की अध्यक्ष वीणा सहसत्रबुद्धे की ही शिष्या और विख्यात गायिका सुलेखा भट ने बताया कि कला समूह संगीत के प्रचार प्रसार के लिए विगत 15 वर्षो ने अनेक आयोजन करता रहा है. गुरु के अवसान के बाद उनकी स्मृति में ये आयोजन लगातार 8 वर्षो से जारी है. संस्कार भारती भारतीय ज्ञान परम्परा और कला के संवर्धन के लिए निरंतर कार्यक्रम कर रहा है.
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